डिजिटल डेस्क। मिरर मीडिया : दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक सुनवाई के दौरान ‘सिटीजन फॉर जस्टिस’ संगठन के नेताओं को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका ‘Gen-Z’ की श्रेणी में नहीं आते। इसके साथ ही, अदालत ने संगठन के बदल रहे तेवर और उद्देश्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए, जिसके बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।
उम्र और मंशा पर उठे सवाल
न्यायिक हिरासत बढ़ाने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए बेंच ने दोनों नेताओं से उनकी उम्र के बारे में पूछताछ की।अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब शांति और व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा हो, तो कई अहम सवाल खड़े होते हैं—जैसे कि आप कौन हैं, आपका संगठन क्या है और इसका असल उद्देश्य क्या है? अदालत ने आगे कहा कि जुलाई में जब वे पहली बार विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में आए थे, तब संगठन का नाम तो वही था, लेकिन उसका मकसद और एजेंडा बदल चुका था। पीठ ने दो टूक कहा, लोग वही हैं, पर मकसद बदल रहा है। है ना?
क्या अधिकारियों को सख्ती बरतने का हक नहीं?
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को आड़े हाथों लेते हुए सवाल किया कि जब एक ही समूह द्वारा बार-बार शांति भंग की जा रही है, तो क्या प्रशासनिक अधिकारियों को कानून के तहत सख्ती बरतने का पूरा अधिकार नहीं है? अदालत ने यह भी विचार करने को कहा कि क्या अनुच्छेद 226 के तहत अभी इन मामलों में दखल देना सही है या फिर कानूनी प्रक्रियाओं को अपने तय क्रम से चलने देना चाहिए।
याचिका वापस ली गई
सुनवाई के दौरान बेंच ने तंज कसते हुए सुझाव दिया कि मौजूदा हालात को देखते हुए याचिकाकर्ताओं के लिए यही बेहतर होगा कि वे थोड़ा पीछे हट जाएं और स्थिति की नजाकत को समझें। कोर्ट के इस कड़े रुख और तीखे सवालों के बाद, सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिका वापस ले ली।

