डिजिटल डेस्क।जमशेदपुर: औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में यूं तो आपदाओं से निपटने के लिए कई तरह के इंतजाम मौजूद हैं, लेकिन एक ऐसी विसंगति या कमी है जो हर बार किसी अनहोनी के वक्त शहरवासियों को गहरे सदमे में डाल जाती है। वह है— शहर में राष्ट्रीय आपदा मोचन दल के स्थायी बेस कैंप का न होना। हाल ही में जमशेदपुर अभिभावक संघ के अध्यक्ष डॉ. उमेश कुमार की ओर से देश के गृहमंत्री, झारखंड के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त और धालभूम के अनुमंडल पदाधिकारी को एक ज्ञापन सौंपकर इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत ठोस कदम उठाने की मांग की गई है।
क्यों पड़ती है एनडीआरएफ की जरूरत?
शहर में पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े गवाही देते हैं कि पानी में डूबने की दुर्घटनाओं में लगातार इजाफा हुआ है। ऐसे हादसों के समय शहरवासियों को पूरी तरह स्थानीय गोताखोरों पर निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि ये गोताखोर अपनी क्षमता के अनुसार पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन आधुनिक तकनीकी बारीकियों और गहरे पानी में बचाव कार्यों के विशेष प्रशिक्षण के अभाव में वे कई बार लाचार नजर आते हैं। स्थिति तब और भी दिल दहला देने वाली हो जाती है जब अधिक गहराई में डूबे व्यक्ति को समय पर बाहर न निकाल पाने के कारण उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है।
घंटों का इंतजार और कीमती समय की बर्बादी
स्थानीय स्तर पर जब प्रयास विफल हो जाते हैं और कोई अन्य उम्मीद नहीं बचती, तब अंत में शव या पीड़ित को बाहर निकालने के लिए रांची या अन्य केंद्रों से NDRF की टीम को बुलाना पड़ता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
फंस जाता है कीमती समय: एनडीआरएफ टीम के जमशेदपुर पहुंचने का इंतजार करने में घंटों बर्बाद हो जाते हैं, जबकि किसी भी डूबते हुए व्यक्ति को बचाने के लिए शुरुआती कुछ मिनट ही सबसे ज्यादा कीमती होते हैं।
सिर्फ शव ढूंढने तक सिमट जाता है काम: जब तक एनडीआरएफ पहुंचती है, तब तक ज्यादातर मामलों में समय बीत जाने के कारण व्यक्ति को जीवित बचाना असंभव हो जाता है और कार्रवाई केवल शव बाहर निकालने तक सीमित रह जाती है।
शहरवासियों की एकसुर में मांग: बने स्थायी बेस
डॉ. उमेश कुमार और शहर के प्रबुद्ध नागरिकों ने प्रशासन के समक्ष पुरजोर मांग उठाई है कि अगर जमशेदपुर में ही एनडीआरएफ का एक स्थायी बेस या कैंप स्थापित कर दिया जाए, तो आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई हो सकेगी और अनगिनत जिंदगियों को समय रहते सकुशल बचाया जा सकेगा। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और राज्य सरकार इस संवेदनशील व जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दे पर कितनी जल्दी संज्ञान लेती है।

