छावनी फुटबॉल मैदान में प्रवचन का 12वां दिन, कर्म मार्ग पर विस्तृत व्याख्या

KK Sagar
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रामगढ़: छावनी फुटबॉल मैदान में ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 20 दिवसीय प्रवचन श्रृंखला के 12वें दिन पूज्य स्वामी श्री युगल शरण जी ने कर्म मार्ग के विषय में गहन और विस्तृत व्याख्यान दिया। प्रवचन के दौरान उन्होंने कर्म, धर्म और भक्ति के वास्तविक स्वरूप को सरल उदाहरणों के माध्यम से श्रोताओं के सामने रखा।

स्वामी युगल शरण जी ने कहा कि कर्म मार्ग को सही रूप में समझना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने वेदों का उल्लेख करते हुए बताया कि सत्य बोलना, धर्म का पालन करना, माता-पिता और गुरु की सेवा करना ही वास्तविक धर्म है। भगवान भी यही कहते हैं कि श्रुति-स्मृति में बताए गए कर्म-धर्म का पालन प्रत्येक जीव को करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि केवल कर्म करने से मुक्ति संभव नहीं है। वेदों और उपनिषदों का हवाला देते हुए स्वामी जी ने कहा कि कर्म से अधिकतम स्वर्ग की प्राप्ति होती है, लेकिन उससे माया निवृत्ति और ब्रह्म प्राप्ति संभव नहीं है। कर्म-धर्म को ही अंतिम लक्ष्य मान लेना जीव को भटकाने वाला है।

प्रवचन में उन्होंने कर्म के चार प्रकार— कर्म, विकर्म, अकर्म (कर्मयोग) और कर्मसंन्यास —का विस्तार से वर्णन किया।

उन्होंने बताया कि नित्य, नैमित्तिक, काम्य और प्रायश्चित कर्म कर्मकांड के अंतर्गत आते हैं, जिनका पालन कलयुग में अत्यंत कठिन बल्कि असंभव है। नियमों में जरा सी भी त्रुटि होने पर फल के बजाय दंड मिलता है और सही पालन होने पर भी केवल स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

स्वामी जी ने कहा कि विकर्म वह है जिसमें न तो शास्त्रीय कर्म होता है और न ही भक्ति। ऐसे कर्म नरक का कारण बनते हैं। वहीं कर्मयोग को सर्वोत्तम मार्ग बताते हुए उन्होंने कहा कि कर्मयोगी शरीर से कर्म करता है लेकिन मन से भगवान की भक्ति करता है, जिससे उसे भगवत् प्राप्ति होती है।

कर्मसंन्यास में व्यक्ति शारीरिक कर्म का त्याग कर केवल मन से भक्ति करता है, लेकिन सामान्य जन के लिए कर्मयोग अधिक उपयुक्त और श्रेष्ठ मार्ग है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भगवान शरीर से किए गए कर्म नहीं, बल्कि मन की भावना को देखते हैं। संसार को शरीर चाहिए और भगवान को मन। इसी कारण भगवान स्वयं अवतार लेकर कर्म करते हैं ताकि जीवों को सही मार्ग की प्रेरणा मिल सके।

प्रवचन के अंत में स्वामी युगल शरण जी ने कहा कि केवल कर्म निंदनीय है, लेकिन कर्म के साथ भक्ति वंदनीय है। कर्मी भी सद्संग और महापुरुषों की कृपा से कर्मयोगी बन सकता है और माया निवृत्ति कर सकता है। उन्होंने श्रोताओं से शारीरिक धर्म से ऊपर उठकर आध्यात्मिक धर्म अपनाने का आह्वान किया।

प्रवचन को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने गहन आध्यात्मिक चर्चा से आत्मिक लाभ प्राप्त किया।

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