60 साल का नक्सलवाद (‘लाल आतंक’) अब अंतिम दौर में : अमित शाह का सख्त संदेश—हथियार उठाने वालों को चुकाना होगा हिसाब

KK Sagar
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करीब छह दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहे नक्सलवाद पर अब निर्णायक प्रहार होता दिखाई दे रहा है। 30 मार्च को लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो भी हथियार उठाएगा उसे उसका हिसाब चुकाना होगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि देश अब लगभग ‘लाल आतंक’ से मुक्त हो चुका है और 2026 तक नक्सलवाद को समाप्त करने का लक्ष्य लगभग हासिल कर लिया गया है।

🔴 नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ ‘लाल आतंक’

नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी, जहां जमींदारी प्रथा के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह भड़का। इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे चारु माजूमदार और कानू सान्याल थे, जो चीन के नेता माओत्से तुंग की विचारधारा से प्रभावित थे। इसी वजह से इस आंदोलन को माओवाद भी कहा गया।

1969 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट (CPML) का गठन हुआ और ‘जमीन उसी की जो खेती करे’ जैसे नारों के साथ यह आंदोलन तेजी से फैलने लगा। शुरुआती दौर में इसका प्रभाव इतना बढ़ा कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और 1977 में वामपंथी सरकार सत्ता में आई।

📍 12 राज्यों तक फैला नेटवर्क

समय के साथ नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से निकलकर बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, केरल, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक फैल गया। अपने चरम पर यह आंदोलन 12 राज्यों में सक्रिय था।

2004 से 2014 के बीच यह आंदोलन अपने सबसे हिंसक दौर में था। इस दौरान 16,463 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1,851 सुरक्षाकर्मी और 4,766 नागरिक मारे गए।

⚠️ बड़े हमलों ने देश को झकझोरा

नक्सलियों ने कई बड़े हमलों को अंजाम दिया, जिनमें 2010 का दंतेवाड़ा हमला और 2013 का झीरम घाटी हत्याकांड शामिल हैं। झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमले में करीब 28 लोगों की मौत हुई थी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।

🛡️ 2014 के बाद बदली रणनीति

2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया। केंद्र ने एक समन्वित और बहुआयामी योजना लागू की, जिसके पांच मुख्य स्तंभ रहे:

खुफिया-आधारित ऑपरेशन: सटीक सूचना पर छोटे और प्रभावी ऑपरेशन

फोर्स मॉडर्नाइजेशन: पुलिस और सुरक्षा बलों को आधुनिक हथियार व संसाधन

फंडिंग पर रोक: NIA और ED की कार्रवाई से 92 करोड़ की संपत्ति जब्त

इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास: 12,000 किमी सड़कें, 8,500 मोबाइल टावर

आत्मसमर्पण नीति: लाखों रुपये के पैकेज से बड़ी संख्या में सरेंडर

⚔️ बड़े ऑपरेशन जिन्होंने बदली तस्वीर

नक्सलवाद के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन चलाए गए, जिनमें प्रमुख हैं:

ऑपरेशन स्टीपलचेस (1971) – शुरुआती बड़ा सैन्य अभियान

ऑपरेशन ग्रीन हंट (2009) – बहु-राज्य समन्वित कार्रवाई

ऑपरेशन प्रहार (2017) – सुकमा में बड़ा हमला

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट (2025) – 270 नक्सली ढेर, 1200+ सरेंडर

इन अभियानों ने नक्सलियों के नेटवर्क को गहराई से कमजोर किया।

🎯 शीर्ष कमांडरों का सफाया

2024-25 में सुरक्षा बलों ने माओवादी नेतृत्व पर सीधा प्रहार किया। इनमें सबसे बड़ा नाम नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू का रहा, जो संगठन का शीर्ष कमांडर था। इसके अलावा कई बड़े नेता मारे गए, जिससे संगठन का ढांचा लगभग ध्वस्त हो गया।

📉 अब सिर्फ कुछ जिलों तक सीमित

सरकारी आंकड़ों के अनुसार:

2014 में 126 जिले प्रभावित थे, अब सिर्फ 11

गंभीर रूप से प्रभावित जिले घटकर 7

अत्यधिक प्रभावित जिले 36 से घटकर 3

सक्रिय माओवादी 2000 से घटकर लगभग 220

सुरक्षाबलों ने बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ और अबूझमाड़ जैसे मजबूत गढ़ों पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया है।

🟢 लगभग खत्म हुआ ‘लाल आतंक’

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य लगभग पूरा हो चुका है। अब यह आंदोलन अपने सबसे कमजोर दौर में है और केवल कुछ सीमित क्षेत्रों में सिमट कर रह गया है।

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