इसरो ने रचा इतिहास, अंतरिक्ष में भेजा ‘अन्वेषा’ सैटेलाइट; जानिए उपग्रह की खासियत

Neelam
By Neelam
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भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक नया अध्याय जुड़ गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने सोमवार को वर्ष 2026 का अपना पहला अंतरिक्ष मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इसरो ने आज PSLV-C62/ईओएस-एन1 मिशन के तहत डीआरडीओ द्वारा विकसित अत्यंत गोपनीय हाइपरस्पेक्ट्रल निगरानी उपग्रह ‘अन्वेषा’ का सफल प्रक्षेपण किया है।

इसरो ने सोमवार सुबह करीब सवा 10 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी62 का सफल प्रक्षेपण किया। यह पीएसएलवी की 64वीं उड़ान रही, जिसमें मुख्य पेलोड के रूप में पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘ईओएस-एन1’ शामिल है। यह उपग्रह थाईलैंड और ब्रिटेन की संयुक्त तकनीक से तैयार किया गया है। इसके अलावा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के जरिए 14 अन्य उपग्रह (देशी और विदेशी ग्राहकों के) भी लॉन्च किए जाएंगे। प्रक्षेपण के लगभग 17 मिनट बाद सभी उपग्रहों को सूर्य की समकालिक कक्षा में स्थापित किया जाएगा। पूरा मिशन दो घंटे से अधिक समय तक चलेगा। प्रक्षेपण यान और उपग्रहों का एकीकरण पूरा हो चुका है और प्रक्षेपण से पहले की जांच अंतिम चरण में है।

दुश्मन की निगरानी करेगा उपग्रह ‘अन्वेषा’

उपग्रह अन्वेषा पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए तस्वीरें लेगा। इसमें हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर लगे हैं, जो साधारण कैमरों से ज्यादा स्मार्ट हैं। यह आसमान से दुश्मन की हर हरकत पर नजर रख सकता है। इसे डीआरडीओ ने विकसित किया है। इस लॉन्च में दो सॉलिड स्ट्रैप-ऑन मोटर वाले पीएसएलवी-डीएल वेरिएंट का इस्तेमाल किया जाएगा। यह मिशन पीएसएलवी रॉकेट की 64वीं उड़ान है। 

देश का सबसे अहम डिफेंस सैटेलाइट ‘अन्वेषा’

पीएसएलवी-सी62 मिशन एक बहुत ही अहम अंतरिक्ष मिशन है। यह सिर्फ एक नियमित प्रक्षेपण नहीं है। 16 उपग्रहों को सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित करने वाला यह मिशन वैश्विक स्मॉल-सैटेलाइट लॉन्च बाजार में भारत की बढ़ती पकड़ को दिखाता है। मिशन का प्रमुख उपग्रह EOS-N1, जिसे ‘अन्वेषा’ नाम दिया गया है। यह  रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित एक उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है।

चीन के बाद दूसरा देश

अपने इस मिशन के साथ भारत इसके साथ अंतरिक्ष में सैटेलाइट रिफ्यूलिंग तकनीक हासिल करने वाला दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा। इस क्षेत्र में अभी तक केवल चीन ने ही सफल प्रदर्शन किया है, जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे महाशक्तियां अभी भी इस तकनीक को अंतरिक्ष में साबित नहीं कर पाई हैं।

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