डिजिटल डेस्क।जमशेदपुर: पश्चिमी सिंहभूम का सारंडा जंगल, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, इन दिनों निर्दोष ग्रामीणों के लिए डेथ ज़ोन बनता जा रहा है। माओवादियों द्वारा सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए बिछाए गए आईईडी अब उन ग्रामीणों का खून बहा रहे हैं, जो अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। तिरिलपोसी जंगल में हुए एक भीषण विस्फोट ने एक बार फिर पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया है।
शाम की वापसी और अचानक हुआ धमाका
जानकारी के अनुसार तिरिलपोसी गांव के जयसिंह चेरवा और सालाई चेरवा सहित 6-7 ग्रामीणों का समूह सुबह जंगल में पत्ता तोड़ने गया था। दिन भर काम करने के बाद जब वे सुरक्षित घर लौटने की उम्मीद में वापस आ रहे थे, तभी जयसिंह का पैर जमीन के नीचे दबे एक आईईडी पर पड़ गया। धमाका इतना जोरदार था कि जयसिंह और सालाई उसकी चपेट में आकर बुरी तरह लहूलुहान हो गए।
रेस्क्यू ऑपरेशन में ‘अदृश्य मौत’ का साया
हादसे की खबर मिलते ही सुरक्षा बल सक्रिय हुए, लेकिन बचाव कार्य किसी चुनौती से कम नहीं था। घना जंगल, गहराता अंधेरा और कदम-कदम पर अन्य आईईडी होने की आशंका ने राहत कार्य की रफ्तार धीमी कर दी। डर का आलम यह था कि घायल जयसिंह और सालाई के साथ गए अन्य ग्रामीण भी दहशत के मारे घंटों जंगल से बाहर नहीं निकल सके।
बेजुबान और इंसान, सब निशाने पर
सारंडा में आईईडी का आतंक केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। यह समस्या अब एक बड़े मानवीय और पर्यावरणीय संकट का रूप ले चुकी है।
वन्यजीवों पर कहर: अब तक तीन जंगली हाथी इन विस्फोटों की बलि चढ़ चुके हैं, जबकि एक घायल हाथी आज भी दर्द में जंगल में भटक रहा है।
मासूमों की जान: इससे पहले कोलबोंगा और दीघा क्षेत्रों में हुई ऐसी ही घटनाओं में दो किशोरियों की जान जा चुकी है।
आजीविका पर संकट: पत्ता और दातून चुनकर गुजारा करने वाले ग्रामीणों के लिए अब जंगल में कदम रखना जान जोखिम में डालने जैसा है।
ग्रामीणों की मांग: ‘हमें खौफ से आजादी चाहिए’
लगातार हो रही इन घटनाओं से स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश और डर है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे जंगल क्षेत्र को आईईडी मुक्त बनाने के लिए व्यापक अभियान चलाया जाए। सवाल यह है कि आखिर कब तक अपनी ही जमीन पर रोजी-रोटी की तलाश में निकले ग्रामीणों को इस बारूदी जंग की कीमत चुकानी पड़ेगी?

