रामगढ़। ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण छावनी फुटबॉल मैदान में चल रही दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के 15वें दिन पूज्य स्वामी युगल शरण जी ने ज्ञान मार्ग पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके सरल, सहज और गूढ़ तत्वों को स्पष्ट करने वाले प्रवचनों से श्रोताओं के बीच विशेष उत्साह देखने को मिला।
प्रवचन के दौरान स्वामी जी ने कहा कि अनंत कोटि जीवों में केवल मनुष्य ही भगवत् प्राप्ति करने में सक्षम है, क्योंकि मनुष्य ज्ञान प्रधान और कर्म प्रधान है। भगवान द्वारा प्रदत्त ज्ञान का सदुपयोग कर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है। उन्होंने कबीर के वचन “ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः” का उल्लेख करते हुए बताया कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। गीता के श्लोक “उदाराः सर्व एवैते ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्” के माध्यम से उन्होंने समझाया कि ज्ञानी भगवान को सर्वाधिक प्रिय होता है।
स्वामी जी ने कहा कि करोड़ों वर्षों में कोई एक सच्चा ज्ञानी बन पाता है, क्योंकि ज्ञान मार्ग अत्यंत कठिन है। शास्त्रों में ज्ञान की प्रशंसा और निंदा दोनों मिलती है, इसलिए यह समझना आवश्यक है कि कौन सा ज्ञान वंदनीय है और कौन सा निंदनीय। तुलसीदास के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है, किंतु केवल शाब्दिक ज्ञान, जिसमें अनुभव का अभाव हो, वह निंदनीय है।
उन्होंने ज्ञान के दो प्रकार बताए—
पहला, सांसारिक या शाब्दिक ज्ञान और दूसरा, ईश्वरीय या अनुभवात्मक ज्ञान। शास्त्रों का केवल कंठस्थ ज्ञान यदि अनुभूति से रहित हो तो वह मिथ्या अहंकार को जन्म देता है, जो साधक को भगवान से दूर कर देता है। सच्चा ज्ञानी वही है जिसके भीतर अनुभवात्मक ज्ञान हो।
स्वामी जी ने आत्मज्ञानी और परमात्मज्ञानी का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि आत्मज्ञानी अभी पूर्ण अवस्था में नहीं होता, जबकि परमात्मज्ञानी पूर्ण ज्ञानी होता है। उन्होंने बताया कि घोर वैराग्य वाला साधक ही ज्ञान मार्ग का आश्रय ले सकता है।
आदि शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” की व्याख्या करते हुए स्वामी जी ने कहा कि ब्रह्म जिज्ञासा की अवस्था तक पहुंचने के लिए साधक को लंबी साधना से गुजरना पड़ता है। ज्ञान मार्ग में प्रवेश के लिए साधन चतुष्टय—विवेक, वैराग्य, शमादि गुण संपन्नता और मुमुक्षुत्व आवश्यक है। इसके साथ ही श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि को उन्होंने ज्ञान मार्ग की आठ कक्षाओं के रूप में समझाया।
स्वामी जी ने बताया कि निदिध्यासन के बाद समाधि की अवस्था आती है, जहां साधक “अहं ब्रह्मास्मि” की अनुभूति कर निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करता है और पंचतत्वों से परे हो जाता है।
कार्यक्रम का आयोजन ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा किया गया है। प्रवचन श्रृंखला में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने ज्ञान मार्ग पर दिए गए प्रवचनों को अत्यंत प्रेरणादायक बताया।

