मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया महाभियोग प्रस्ताव खारिज कर दिया गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन दोनों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही अब ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहेंगे और उनके खिलाफ कोई कानूनी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
🔹 193 सांसदों ने किया था प्रस्ताव पेश
विपक्षी दलों के कुल 193 सांसदों—लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63—ने 12 मार्च को यह नोटिस सौंपा था। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग करते हुए उन पर 7 गंभीर आरोप लगाए गए थे।
🔹 क्या थे आरोप?
विपक्ष ने सीईसी पर कई गंभीर आरोप लगाए, जिनमें शामिल हैं:
पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण रवैया
दुर्व्यवहार
चुनावी धोखाधड़ी के आरोप
वोट देने के अधिकार से वंचित करना
खास तौर पर बिहार और पश्चिम बंगाल में चल रही वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए। विपक्ष का दावा था कि इस प्रक्रिया के चलते कई मतदाताओं का नाम सूची से हट गया।
🔹 BJP को फायदा पहुंचाने का आरोप
विपक्ष ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया का उद्देश्य केंद्र में सत्ताधारी पार्टी को लाभ पहुंचाना था। साथ ही यह भी कहा गया कि चुनाव आयोग ने कुछ राजनीतिक दलों के पक्ष में काम किया।
🔹 संवैधानिक प्रावधानों का हवाला
नोटिस में संविधान के अनुच्छेद 324(5), निर्वाचन आयुक्तों से जुड़े कानून 2023 और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 का हवाला दिया गया था।
🔹 क्यों खारिज हुआ प्रस्ताव?
लोकसभा सचिवालय के अनुसार, नोटिस में दिए गए तथ्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया गया। लेकिन महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक पर्याप्त आधार नहीं पाए गए।
राज्यसभा के महासचिव पी.सी. मोदी ने भी जानकारी दी कि उच्च सदन में प्रस्तुत नोटिस भी आवश्यक मानकों को पूरा नहीं करता था।
🔹 क्या है हटाने की प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया न्यायाधीशों के समान होती है। यानी केवल “सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता” के आधार पर ही महाभियोग लाया जा सकता है—और उसके लिए ठोस प्रमाण जरूरी होते हैं।
विपक्ष के आरोपों के बावजूद, पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया है। इससे स्पष्ट है कि ज्ञानेश कुमार फिलहाल अपने पद पर बने रहेंगे और चुनाव आयोग की जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।

