पाकुड़ जिले में पशुपालन स्वरोजगार की दिशा में एक नई इबारत लिख रहा है। वन एवं पहाड़ियों से आच्छादित यह क्षेत्र जहाँ कृषि कार्य में आंशिक चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर पशुपालन के लिए अत्यंत अनुकूल वातावरण भी प्रदान करता है। पशुपालन गतिविधियाँ न केवल आय का सशक्त स्रोत बन रही हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर व्यापक स्वरोजगार का सृजन कर पलायन रोकने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
संवाददाता: अभिषेक तिवारी

मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना से स्वरोजगार को पंख
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने, पलायन पर रोक लगाने तथा राज्य को दूध, अंडा एवं मांस उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना संचालित की जा रही है। इस बहुउद्देशीय योजना के अंतर्गत गाय पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन (ब्रॉयलर एवं लेयर) तथा बत्तख पालन हेतु अनुदानित दर पर पशु/पक्षी, आवश्यक उपकरण, बीमा एवं अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
सुकर पालन से आत्मनिर्भरता की मिसाल
पाकुड़ प्रखंड के शहरकोल पंचायत अंतर्गत ग्राम आसनडिप्पा निवासी बेंजामिन किस्कु ने स्वरोजगार के रूप में सुकर पालन को अपनाया। पशुपालन विभाग से मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना अंतर्गत सुकर विकास योजना के तहत उन्हें चार मादा एवं एक नर सुकर की लघु प्रजनन इकाई अनुदानित दर पर प्राप्त हुई। साथ ही योजना के प्रावधानों के अनुसार पशुओं का बीमा एवं खाद्यान्न भी उपलब्ध कराया गया। पिछले लगभग डेढ़ वर्षों से किस्कु पशुपालन विभाग द्वारा प्रदान किए गए निःशुल्क प्रशिक्षण एवं उन्नत तकनीकों के माध्यम से सुकर पालन कर रहे हैं। प्रखंड पशुपालन पदाधिकारी डॉ. अभिषेक यादव ने उनके फार्म निरीक्षण के दौरान बताया कि अब तक किस्कु द्वारा लगभग 30 व्यस्क सुकरों का उत्पादन किया जा चुका है, जिनमें से कई का सफलतापूर्वक विक्रय भी किया गया है। इस गतिविधि से उन्हें औसतन ₹30,000 प्रतिमाह की आय हो रही है।
आर्थिक सशक्तिकरण और प्रेरणा का स्रोत
बेंजामिन किस्कु ने बताया कि पशुपालन ने उनके आर्थिक जीवन को पूरी तरह बदल दिया है और अब वे स्वयं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महसूस करते हैं। उन्होंने जिले के अन्य युवाओं से अपील किया कि वे भी पशुपालन को अपनाकर स्वरोजगार की राह चुनें और राज्य के विकास में अपना योगदान दें।

