डिजिटल डेस्क।जमशेदपुर: क्या आपने कभी सोचा है कि अंतरिक्ष में घूमने वाले अरबों रुपये के सैटेलाइट्स और उनके सेंसर्स का आइडिया वैज्ञानिकों को कहां से मिला? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व अध्यक्ष और पद्मश्री एएस किरण कुमार के अनुसार, इसका जवाब कहीं और नहीं बल्कि हमारे अपने शरीर में छिपा है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन ‘GISRS-2026’ के उद्घाटन के दौरान उन्होंने विज्ञान और प्रकृति के बीच के उस गहरे संबंध को उजागर किया, जिसे जानकर युवा शोधार्थी दंग रह गए।
हमारी आंखें और कान ही हैं असली ‘सेंसर्स’
एएस किरण कुमार ने सम्मेलन में एक दिलचस्प तुलना पेश की। उन्होंने कहा हमारी आंखें, नाक, कान, जीभ और त्वचा प्राकृतिक सेंसर्स हैं जो पर्यावरण से डेटा इकट्ठा करते हैं। हमारा मस्तिष्क इस डेटा को प्रोसेस कर निर्णय लेता है। हमारी याददाश्त इस जानकारी को सुरक्षित रखती है। उन्होंने बताया कि सैटेलाइट्स और रोबोटिक प्रणालियों की संरचना इसी प्राकृतिक सिस्टम से प्रेरित है। भविष्य की तकनीकी प्रगति के लिए प्रकृति की इस इंजीनियरिंग को समझना बेहद जरूरी है।
‘विकसित भारत-2047′ में भू-स्थानिक तकनीक की भूमिका
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीयूजे के प्रभारी कुलपति प्रो. आरके डे ने जोर दिया कि रिमोट सेंसिंग और GIS (जियोग्राफिक इन्फार्मेशन सिस्टम) अब केवल किताबी विषय नहीं, बल्कि नीति निर्माण के अनिवार्य हिस्से हैं।
सम्मेलन की मुख्य बातें: आपदा से लेकर AI तक
दो दिनों तक चले इस मंथन (GISRS-2026) में देशभर के 50 से अधिक शोध पत्र पढ़े गए।
चर्चा के मुख्य बिंदु
डिजिटल ट्विन: जंगलों और पर्यावरण का एक ‘आभासी मॉडल’ तैयार करना ताकि भविष्य के खतरों का पहले ही अंदाजा लग सके।
झारखंड में वज्रपात: राज्य में बिजली गिरने की बढ़ती घटनाओं और उससे होने वाले नुकसान पर विशेष शोध प्रस्तुत किया गया।
AI और मशीन लर्निंग: सैटेलाइट से मिलने वाले भारी-भरकम डेटा के विश्लेषण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर चर्चा हुई।
डेटा गाइडलाइंस 2021: विशेषज्ञों ने बताया कि नई उदार नीतियों से शोधकर्ताओं के लिए डेटा पाना अब आसान हो गया है।
विज्ञान के साथ संस्कृति का संगम
सम्मेलन केवल गंभीर चर्चाओं तक सीमित नहीं था। SPIC MACAY के सहयोग से हुए शास्त्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने विज्ञान और कला के बीच संतुलन बनाया। समापन के बाद प्रतिभागियों को पतरातू घाटी और डैम का शैक्षिक भ्रमण भी कराया गया, ताकि वे छोटानागपुर पठार की भौगोलिक विशेषताओं को जमीनी स्तर पर समझ सकें।

