झारखंड विधानसभा चुनाव में अब केवल 15 दिन बाकी हैं, और राज्य एक बार फिर अपनी अगली सरकार चुनने के लिए तैयार है। झारखंड का राजनीतिक इतिहास लगातार अस्थिरता और गठबंधनों के साथ रहा है। 2000 में अलग राज्य बनने के बाद से ही यहां राजनीतिक अस्थिरता इतनी गहरी रही है कि 24 वर्षों में कुल 13 मुख्यमंत्री बन चुके हैं और तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लागू करना पड़ा। 2005 से लेकर 2019 तक सरकारें बनती और गिरती रहीं, जिससे प्रदेश की स्थिरता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा।
प्रदेश में कुल 81 विधानसभा सीटें हैं, और बहुमत के लिए 41 सीटों की जरूरत होती है। हालांकि, पिछले 24 वर्षों में हुए 5 चुनावों में से किसी भी पार्टी को अकेले इतने सीटें हासिल नहीं हुईं। वर्तमान में राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के नेतृत्व में इंडिया ब्लॉक की सरकार है और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं। 2019 में हेमंत सोरेन ने कांग्रेस और आरजेडी के साथ गठबंधन करके बीजेपी को हराया था।
चुनावी समीकरण: एनडीए और इंडिया ब्लॉक आमने-सामने
इस बार का चुनाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। 2019 में बीजेपी ने झारखंड में अकेले चुनाव लड़ा था, जिसमें रघुवर दास मुख्यमंत्री उम्मीदवार थे। लेकिन, उन्हें खुद अपनी सीट पर हार का सामना करना पड़ा, जब बीजेपी के ही बागी नेता सरयू राय ने उन्हें जमशेदपुर पूर्व सीट से पराजित कर दिया। 2019 में बीजेपी को मात्र 25 सीटें मिली थीं, जो बहुमत से काफी दूर थीं।
हालांकि, इस बार बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और सहयोगियों को साथ लिया है। एनडीए के तहत बीजेपी के साथ आजसू पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लोजपा-रामविलास (एलजेपी) भी शामिल हैं। दूसरी ओर, इंडिया ब्लॉक के तहत हेमंत सोरेन की पार्टी जेएमएम कांग्रेस और आरजेडी के साथ मिलकर फिर से मैदान में उतरी है।
हेमंत सोरेन पर भ्रष्टाचार के आरोप और आदिवासी वोट बैंक पर संघर्ष
झारखंड की राजनीति में आदिवासी वोट बैंक एक निर्णायक कारक है। हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी जेएमएम ने इस वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए कई योजनाएं चलाई हैं। हालांकि, हाल ही में हेमंत सोरेन पर मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। जेल जाने के बाद उन्होंने चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बना दिया था, लेकिन जेल से बाहर आते ही उन्हें हटाकर खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली। इससे नाराज चंपई सोरेन बीजेपी में शामिल हो गए, जो अब आदिवासी वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है।
बीजेपी की रणनीति में इस बार चंपई सोरेन जैसे आदिवासी नेताओं को साधने का प्रयास शामिल है, जो जेएमएम के लिए एक चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर, हेमंत सोरेन बीजेपी पर लगातार सरकार अस्थिर करने का आरोप लगाते हुए आदिवासियों की सहानुभूति हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।
एंटी-इनकंबेंसी और जनता की पसंद का इंतजार
हेमंत सोरेन सरकार को एंटी-इनकंबेंसी का सामना भी करना पड़ सकता है। पिछले 5 वर्षों में हेमंत सोरेन सरकार पर जनता की नाराजगी का असर देखने को मिल सकता है। जहां एनडीए ब्लॉक अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में है, वहीं इंडिया ब्लॉक हेमंत सोरेन के नेतृत्व में अपने पुराने गठबंधन के बल पर फिर सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रहा है।
अंतिम परिणाम 23 नवंबर को घोषित होंगे, जिससे यह तय होगा कि क्या झारखंड की जनता गठबंधन की सरकार की अस्थिरता से उब कर किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत देती है, या फिर एक बार फिर से गठबंधन की राजनीति का सिलसिला जारी रहता है।