मकर संक्रांति पर शिक्षा और कृतज्ञता का भावपूर्ण संगम, राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर के प्रथम अभिभावक प्रतिनिधि गोरखनाथ राय सम्मानित

KK Sagar
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धनबाद। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर शिक्षा, संस्कार और कृतज्ञता की भावना से ओत-प्रोत एक अत्यंत आत्मीय सम्मान समारोह का आयोजन राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर, धनबाद के संस्थापक प्राचार्य डॉ. वासुदेव प्रसाद द्वारा किया गया। इस अवसर पर विद्यालय के प्रथम अभिभावक प्रतिनिधि एवं भारतीय रेलवे, भारत सरकार से सेवानिवृत्त मुख्य आरक्षण पर्यवेक्षक गोरखनाथ राय को उनके आवास पर शॉल एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया।

सम्मान के दौरान डॉ. वासुदेव प्रसाद भावुक हो उठे। उन्होंने स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर की स्थापना 20 जुलाई 1978, गुरु पूर्णिमा के पावन दिन मात्र सात विद्यार्थियों के साथ की गई थी। उन्होंने कहा कि यह संस्था केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि अभिभावकों, समिति सदस्यों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, शुभचिंतकों और उनकी आने वाली पीढ़ियों के विश्वास, त्याग और तपस्या की जीवंत गाथा है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि विद्यालय के प्रारंभिक काल से जुड़े सभी विभूतियों एवं उनके परिवारों को चरणबद्ध रूप से सम्मानित किया जाएगा।

इस अवसर पर गोरखनाथ राय के बड़े सुपुत्र शांति भूषण के योगदान का विशेष उल्लेख किया गया। वे राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर के प्रथम बैच (1987) के विद्यार्थी रहे हैं और वर्तमान में इंदौर टनल इंजीनियरिंग परियोजना से जुड़े एक प्रतिष्ठित भूगर्भशास्त्री (जियोलॉजिस्ट) के रूप में कार्यरत हैं। वहीं उनके छोटे सुपुत्र शशि भूषण भी विद्यालय के पूर्व विद्यार्थी रहे हैं, जो परिवार और विद्यालय की शैक्षिक परंपरा की मजबूत कड़ी हैं।

कार्यक्रम में गोरखनाथ राय के पौत्र शिवांश एवं पौत्री समृद्धि की उपस्थिति ने समारोह को पारिवारिक और भावनात्मक गरिमा प्रदान की। साथ ही धनबाद पॉलिटेक्निक के चेयरमैन प्रेम प्रकाश की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया।

समारोह का शुभारंभ मंत्रोच्चार, शांति मंत्र एवं गायत्री मंत्र के सामूहिक पाठ के साथ हुआ। मकर संक्रांति जैसे सामाजिक समरसता के पर्व पर भारत, भारतीयता और ‘हम’ की चेतना को आत्मसात करते हुए शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से अखंड भारत के स्वरूप को सुदृढ़ करने का संदेश दिया गया।

इस अवसर पर डॉ. वासुदेव प्रसाद के सुपुत्र, जो वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय के डोरंडा महाविद्यालय में बी.एड. विभाग में अंग्रेजी विषय के शिक्षक हैं तथा झारखंड सरकार के गवर्नमेंट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, रांची में प्रतिनियोजित हैं, ने भावुक शब्दों में कहा—

“थोड़ी-सी फिक्र, थोड़ी-सी कदर और कभी-कभी खैर-खबर—इन छोटी-छोटी बातों का प्रभाव अत्यंत गहरा और दूरगामी होता है।”

उन्होंने कहा कि आज के एआई—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में समाज की पुरानी विभूतियां आरआई—ऋषि इंटेलिजेंस के रूप में सदैव मार्गदर्शक हैं। उनके अनुभव, संस्कार और जीवन-दृष्टि ही शिक्षा और साहित्य के माध्यम से अखंड भारत की आत्मा को सशक्त बनाते हैं।

यह आयोजन मात्र एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, कृतज्ञता और पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक चेतना का भावपूर्ण उत्सव बनकर उपस्थित सभी के हृदय में अमिट छाप छोड़ गया।

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