हरियाणा के फरीदाबाद से एक बड़े जासूसी नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसमें पाकिस्तान के लिए काम करने वाले गिरोह के सदस्य नौशाद अली उर्फ लालू को गाजियाबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया है। साधारण पंचर बनाने वाले के रूप में छिपकर रह रहा नौशाद संवेदनशील स्थानों की तस्वीरें और वीडियो पाकिस्तान भेजने के नेटवर्क का हिस्सा था।
बिहार के मुजफ्फरपुर का है नौशाद
नौशाद अली उर्फ लालू है, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के कांटी (पनापुर करियात) थाना क्षेत्र के हरचंदा गांव का रहने वाला है। नौशाद फरीदाबाद के गांव नचौली में एक साल पहले खुले पेट्रोल पंप पर तीन महीने से पंचर बनाने की दुकान चला रहा था।
16 मार्च को हुई गिरफ्तारी
16 मार्च की शाम गाजियाबाद पुलिस सादे कपड़ों में लोकेशन ढूंढते हुए पहुंची थी। पुलिसकर्मियों ने पहले एक-एक कर पेट्रोल पंप कर्मियों से नाम और मूल निवास पूछे। पुलिस ने जब कर्मचारियों से नौशाद अली नामक शख्स के बारे में पूछा तो पता चला कि पंचर की दुकाने लगाने वाले शख्स का नाम नौशाद अली उर्फ लालू है जिसके बाद पुलिस उसको पकड़ कर ले गई। पुलिस ने इस दौरान उसका मोबाइल भी अपने कब्जे में ले लिया।
दिल्ली-हरियाणा रेलवे स्टेशन के पास लगाए थे सोलर-पावर्ड कैमरे
नौशाद एक साधारण पंचर बनाने वाली की आड़ में काम करते हुए, भारतीय सेना से जुड़ी गोपनीय रणनीतिक जानकारी सीधे पाकिस्तान भेज रहा था।पुलिस और खुफिया एजेंसियों द्वारा की गई जांच से पता चला है कि यह गिरोह देश-विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर रहा था। आरोपियों ने दिल्ली और हरियाणा के रेलवे स्टेशनों के पास रणनीतिक महत्व वाले स्थानों पर सोलर-पावर्ड कैमरे लगाए थे।
कैमरों का एक्सेस सीधे पाकिस्तान में मौजूद लोगों के पास
गिरोह ने देशभर में करीब 50 सोलर कैमरे लगाने की योजना बनाई गई थी, जिनमें से कुछ दिल्ली, सोनीपत और अन्य रेलवे स्टेशनों के आसपास लगाए भी जा चुके थे। हर कैमरे की इंस्टॉलेशन पर आरोपितों को 10 से 15 हजार रुपए मिलते थे। इन कैमरों का एक्सेस सीधे पाकिस्तान में मौजूद लोगों के पास था, जिससे वहाँ से लाइव गतिविधियाँ देखी जा रही थीं। पुलिस ने इन कैमरों को बरामद कर फोरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया है।
हर तस्वीर या वीडियो के बदले मिलते थे 4 से 6 हजार
ये कैमरे इतनी होशियारी से छिपाए गए थे कि इनका पता लगाना मुश्किल था। इनके जरिए भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। ये लोग सेना और संवेदनशील इलाकों की तस्वीरें और वीडियो बनाते थे। इन्हें पाकिस्तानी व्हाट्सप्प ग्रुप्स पर भेजी गई हर तस्वीर या वीडियो के बदले 4 से 6 हजार रुपये तक की रकम मिलती थी।

