हजारीबाग। भारत तेजी से डिजिटल युग की ओर अग्रसर है और इसका प्रभाव अब न्याय व्यवस्था में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। केंद्र सरकार की डिजिटल पहल के तहत देशभर में ई-कोर्ट व्यवस्था लागू की गई है, जिससे आम लोगों को न्याय से जुड़ी कई सुविधाएं अब ऑनलाइन उपलब्ध हो रही हैं। हजारीबाग सिविल कोर्ट भी इस डिजिटल प्रणाली से जुड़ चुका है, जिसका लाभ आम नागरिकों के साथ-साथ अधिवक्ताओं को भी मिल रहा है।
ई-कोर्ट प्रणाली से न्यायिक सेवा सरल, पारदर्शी और सुलभ
हजारीबाग के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बताया कि ई-कोर्ट प्रणाली के माध्यम से न्यायिक सेवाओं को सरल, पारदर्शी और सुलभ बनाया गया है। उन्होंने जानकारी दी कि उच्चतम न्यायालय द्वारा लगभग 15 वर्ष पूर्व ई-कोर्ट की परिकल्पना की गई थी, जिसे अब चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को आम जनता के लिए सहज बनाना है।
ई-कोर्ट मोबाइल एप से मिलेगी केस से जुड़ी जानकारी
ई-कोर्ट प्रणाली के तहत अब ई-कोर्ट मोबाइल एप के माध्यम से वकील और वादकारी घर बैठे ही अपने केस से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। लोगों को अब अगली सुनवाई की तारीख जानने के लिए बार-बार कोर्ट आने की जरूरत नहीं पड़ती। इस एप के जरिए केस की स्थिति, वाद सूची, अदालत के आदेश और सुनवाई की तारीख आसानी से देखी जा सकती है। इसके अलावा ऑनलाइन केस फाइलिंग और कोर्ट फीस जमा करने की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे लोगों को समय और परेशानी दोनों से राहत मिल रही है।
जरूरत पड़ने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई की सुविधा
हजारीबाग के अधिवक्ताओं का कहना है कि ई-कोर्ट परियोजना से न्यायिक प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी हो गई है। इससे न केवल समय की बचत हो रही है, बल्कि वादकारियों का आर्थिक बोझ भी कम हुआ है। जरूरत पड़ने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने की सुविधा भी उपलब्ध है।
गूगल प्ले स्टोर और एप्पल एप स्टोर पर उपलब्ध
ई-कोर्ट सर्विस मोबाइल एप्लीकेशन गूगल प्ले स्टोर और एप्पल एप स्टोर पर उपलब्ध है। डिजिटल युग में यह सेवा आम जनता के लिए एक बड़ी राहत बनकर सामने आई है। भागदौड़ भरी जिंदगी में ई-कोर्ट जैसी व्यवस्था न्याय को लोगों के और करीब ला रही है।
कुल मिलाकर, ई-कोर्ट व्यवस्था को न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में न्यायिक सुधारों की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

