कक्षा 8 की सोशल साइंस की नई किताब को लेकर उठे विवाद के बीच National Council of Educational Research and Training (एनसीईआरटी) ने बड़ा फैसला लेते हुए ‘ज्यूडिशियल करप्शन’ से जुड़े हिस्से पर रोक लगा दी है। संस्था ने आधी रात को बयान जारी कर स्वीकार किया कि पाठ्य सामग्री में अनजाने में त्रुटि हुई और इसके लिए खेद व्यक्त किया।
यह मामला तब गरमाया जब 24 फरवरी 2026 को जारी कक्षा 8 की पुस्तक “Exploring Society: India and Beyond, Vol II” के अध्याय 4—‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’—में न्यायपालिका से जुड़े कुछ अंशों पर आपत्ति जताई गई। मामला सीधे Supreme Court of India तक पहुंचा, जहां प्रधान न्यायाधीश Surya Kant की पीठ ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कड़ी टिप्पणी की।
CJI की सख्त टिप्पणी, वितरण पर रोक
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि किसी भी संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती और “कानून अपना काम करेगा।” कोर्ट की नाराजगी के बाद शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने भी किताब के वितरण पर अगला आदेश आने तक रोक लगाने का निर्देश दिया। एनसीईआरटी ने तत्काल प्रभाव से बिक्री और वितरण रोक दिया।
क्या था विवादित हिस्सा?
संशोधित अध्याय में न्यायपालिका की संरचना और भूमिका के साथ-साथ उसके सामने मौजूद चुनौतियों—जैसे लंबित मामलों का भारी बोझ, न्यायाधीशों की कमी और पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों—का उल्लेख किया गया था। ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक खंड में आचार संहिता, जवाबदेही तंत्र और शिकायत निवारण प्रक्रिया का जिक्र भी था।
पुस्तक में लंबित मामलों के आंकड़े, केंद्रीकृत सार्वजनिक शिकायत निवारण प्रणाली (CPGRAMS) के माध्यम से प्राप्त शिकायतों का उल्लेख और पूर्व मुख्य न्यायाधीश के एक वक्तव्य का संदर्भ भी शामिल था। इन्हीं बिंदुओं को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
एनसीईआरटी ने क्या कहा?
एनसीईआरटी ने अपने बयान में कहा कि उसका उद्देश्य छात्रों में संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और न्यायपालिका के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना है। किसी संवैधानिक संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था। संस्था ने भरोसा दिलाया कि संबंधित अध्याय को विशेषज्ञों की सलाह से दोबारा लिखा जाएगा और संशोधित संस्करण शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत में उपलब्ध कराया जाएगा।
आगे क्या?
मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। फिलहाल संबंधित चैप्टर पर रोक है और नई संशोधित किताब आने तक पुराना संस्करण ही लागू रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने पाठ्यपुस्तकों की सामग्री, संस्थागत गरिमा और अभिव्यक्ति की सीमा जैसे मुद्दों पर व्यापक बहस छेड़ दी है।

