जमशेदपुर। वर्कर्स महाविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से ‘साहित्य और समाज के अन्तर्सम्बन्ध’ विषय पर एक दिवसीय वेबिनार (तरंगोष्ठी) का आयोजन किया गया। इस तरंगोष्ठी के मुख्यवक्ता जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय चक्रधरपुर के प्राचार्य प्रो.(डॉ.) श्रीनिवास कुमार थे।
तरंगोष्ठी के आरंभ में जमशेदपुर वर्कर्स महाविद्यालय हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. सुनीता गुड़िया ने तरंगोष्ठी में सभी का स्वागत किया। तरंगोष्ठी के संरक्षक सह महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सत्यप्रिय महालिक ने अपने संबोधन में समाज के लोगों के व्यक्तिगत जीवन से साहित्य के दूर होने की प्रवृत्ति की चर्चा करते हुए कहा कि पहले साहित्य का निर्माण समाज के लिए होता था, अब समाज को साहित्य के लिए बनना आवश्यक है। आज हम सब तकनीक से जुड़कर जानकार बन सकते हैं, परंतु विद्वान होने के लिए साहित्य पढ़ना आवश्यक है। व्यक्ति केवल अपना सोचता है परंतु साहित्यकार ही सबके लिए सोचता है।
मुख्य वक्ता प्रो. डॉ. श्रीनिवास कुमार ने ‘साहित्य और समाज के अन्तर्सम्बन्ध’ विषय पर अपने व्याख्यान में साहित्य को मानवता के उत्थान-पतन का साक्षी बताते हुए कहा कि साहित्य ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की जड़ता को तोड़ता है क्योंकि साहित्य में समाज के निर्माण की अपरिमेय शक्ति है। साहित्य की मजबूती सभ्यता और संस्कृति की मजबूती होती है, साहित्य ही व्यक्ति और समाज को उष्मा प्रदान करता है। विश्व मे प्रत्येक बड़ी घटनाओं और क्रांतियों में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इतिहास साक्षी है कि प्रत्येक शासक या सत्ता साहित्य को अपने ढंग से चलाना चाहता है राजनीति अपने गद्दी को बचाने के लिए बाहर से तोड़ने और अंदर से तोड़ने का कार्य कर सकती है, परंतु साहित्य हमेशा जोड़ने का ही कार्य करता है।
साहित्यकार साहित्य को आम जन की पीड़ा और वेदना को प्रकट कर समाज को नवबोध एवं नवीन दिशा प्रदान करते हुए उसे विकास के पथ पर अग्रसर करता है। समाज और साहित्य के अन्योन्याश्रित संबंध की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि समाज के वृन्त पर साहित्य मुस्कुराता हुआ पुष्प है।
इस तरंगोष्ठी का संचालन हिंदी विभाग के प्रो. हरेंद्र पंडित ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. कंचन गिरी ने दिया। आज की इस तरंगोष्ठी में प्रो. प्रितिबाला सिन्हा, प्रो. लाड़ली कुमारी, प्रो. अर्चना गुप्ता, प्रो. एस. के. झा, प्रो. लक्ष्मी कुमारी तथा अन्य शिक्षकगण के साथ-साथ जमशेदपुर महाविद्यालय तथा अन्य महाविद्यालयों के विद्यार्थी और शोधार्थी भी बड़ी संख्या में शामिल हुए।