रामगढ़: ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा छावनी फुटबॉल मैदान में आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला का चौथा दिन श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में पूज्य स्वामी युगल शरण जी का पुष्प गुच्छ अर्पित कर भव्य स्वागत किया गया।
इसके पश्चात स्वामी जी ने अपने चिर-परिचित प्रवचन शैली में “ब्रह्म का स्वरूप” विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भगवान को केवल बुद्धि, मन और इन्द्रियों से जान पाना संभव नहीं है।
भगवान को क्यों नहीं जान सकते?
स्वामी जी ने कठोपनिषद् के श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्द्रियों से परे विषय, विषय से परे मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मा है। आत्मा से परे माया और माया से परे भगवान हैं। इसलिए सीमित इन्द्रियाँ और मन भगवान तक नहीं पहुँच सकते।
इन्द्रिय, मन और बुद्धि से भगवान अग्राह्य
उन्होंने कहा कि मनुष्य की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि प्राकृत हैं, जबकि भगवान दिव्य हैं। प्राकृत साधनों से दिव्य तत्व को ग्रहण नहीं किया जा सकता। तुलसीदास जी के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि विधि, हरि और शंभु भी भगवान को पूर्ण रूप से नहीं जान सकते।
जीव और भगवान में अंतर
स्वामी जी ने जीव और भगवान के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा—
भगवान दिव्य हैं, जीव प्राकृत है।
भगवान प्रेरक हैं, जीव प्रेरित होता है।
भगवान प्रकाशक हैं, जीव प्रकाशित होता है।
भगवान सर्वज्ञ हैं, जबकि जीव अल्पज्ञ है।
उन्होंने कहा कि जो भगवान अनंत ब्रह्मांडों के प्रत्येक जीव के विचारों तक जानते हैं, उन्हें सीमित बुद्धि से समझना संभव नहीं।
भगवान अनंत विरोधी धर्मों का अधिष्ठान
स्वामी जी ने बताया कि भगवान में अनेक विरोधी गुण एक साथ विद्यमान हैं—
वे अखंड ब्रह्मचारी भी हैं और गोपियों के पीछे भी जाते हैं।
वे छोटे से छोटे और बड़े से बड़े हैं।
वे इन्द्रियों से रहित होकर भी सभी इन्द्रियों का कार्य करते हैं।
वे जन्म रहित होकर भी अवतार लेते हैं।
वे स्वतंत्र होकर भी भक्तों के अधीन हो जाते हैं।
सनातन तीन तत्वों का वर्णन
स्वामी जी ने कहा कि सनातन धर्म के तीन नित्य तत्व हैं—
जीव
माया
ब्रह्म
ये तीनों अज (अनादि) हैं, न इन्हें किसी ने बनाया है और न ही कोई इन्हें नष्ट कर सकता है।

