डिजिटल डेस्क। मिरर मीडिया: जिंदगी की बाधाओं को अगर इरादों की ताकत मिल जाए, तो हर पहाड़ बौना साबित हो जाता है। इसे सच कर दिखाया है झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के रहने वाले दो कमाल के युवाओं—शेखर गोप और धीरज कुमार ने। जन्म से दृष्टिबाधित होने के बावजूद इन दोनों ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर हिमालय की दुर्गम और बर्फीली पहाड़ियों पर ऐसा कीर्तिमान रच दिया है, जो पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है।
फुटबॉल के मैदान से शुरू हुआ था हौसले का सफर
24 वर्षीय शेखर गोप और 23 वर्षीय धीरज कुमार केवल पर्वतारोही ही नहीं, बल्कि शानदार फुटबॉल खिलाड़ी भी हैं। शेखर झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम के कप्तान हैं, जबकि धीरज इसी टीम के बेहतरीन खिलाड़ी के रूप में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। फुटबॉल के मैदान से निकला यह अनुशासन और टीम वर्क उनके इस कठिन सफर में सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ।
लद्दाख की मारखा घाटी में दिखाया दम
बीती 25 से 31 अगस्त के बीच लद्दाख की मारखा घाटी में एक विशेष पर्वतारोहण अभियान का आयोजन किया गया था। इस चुनौतीभरे अभियान में शेखर ने अपनी अद्भुत दृढ़ता का परिचय देते हुए 20,472 फीट की ऊंचाई पर स्थित कठिन ‘जो-जोंगो’ चोटी पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया। वहीं, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करने के बावजूद 23 वर्षीय धीरज कुमार ने भी हार नहीं मानी और 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचकर अपनी जीत का परचम लहराया।
’सबल’ पहल ने बदली जिंदगी की तस्वीर
इन दोनों युवाओं के लिए यह मुकाम हासिल करना इतना आसान नहीं था। जन्म से दृष्टिबाधित होने के कारण शुरुआती दौर में उन्हें रोजमर्रा के कामों और स्वतंत्र आवाजाही में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। साल 2022 में टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांग समावेशन पहल ‘सबल’ से जुड़ने के बाद उनके जीवन में एक सकारात्मक मोड़ आया। यहां उन्हें ब्रेल लिपि, डिजिटल तकनीक और स्वतंत्र आवागमन का विशेष प्रशिक्षण मिला। धीरे-धीरे दोनों आत्मनिर्भर बने और बाद में वे खुद मोबिलिटी ट्रेनर बनकर दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को प्रशिक्षित करने लगे।
दलमा की पहाड़ियों में ली थी कड़ी ट्रेनिंग
पर्वतारोहण के इस कड़े इम्तिहान से पहले दोनों ने जमशेदपुर की दलमा पहाड़ियों में पसीना बहाया था। यहां उन्होंने अपनी शारीरिक सहनशक्ति, स्टैमिना और मानसिक मजबूती को परखने के लिए कठिन ट्रेनिंग ली थी। खेल के मैदान से लेकर हिमालय की बर्फीली चोटियों तक का यह सफर साबित करता है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो आंखों की रोशनी की कमी कभी भी सपनों के आड़े नहीं आती।

