देश की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ उस वक्त आया जब केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून 2023 (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को आधी रात से लागू कर दिया। कानून मंत्रालय की ओर से अधिसूचना जारी होते ही यह कानून प्रभाव में आ गया, लेकिन इसके साथ ही संसद से लेकर सियासी गलियारों तक बहस और टकराव भी तेज हो गया है।
संसद में इस मुद्दे को लेकर माहौल काफी गरम रहा। लोकसभा में देर रात तक चली चर्चा में महिला आरक्षण, परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों पर जोरदार बहस हुई। आधी रात के बाद भी कार्यवाही जारी रहने से यह साफ हो गया कि सरकार के इस कदम ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। सत्ता पक्ष इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रहा है, वहीं विपक्ष इसके समय और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।
इस कानून के लागू होने के बाद अब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, इसका सीधा असर तुरंत देखने को नहीं मिलेगा। यह व्यवस्था तब लागू होगी जब देश में अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। ऐसे में माना जा रहा है कि इसका वास्तविक प्रभाव 2029 के आम चुनावों में दिख सकता है।
इसी बीच सरकार ने संसद में सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा प्रस्ताव भी रखा है, जिसमें लोकसभा की सीटें बढ़ाकर करीब 850 करने की बात सामने आई है। इस कदम को महिला आरक्षण के साथ जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे आने वाले समय में चुनावी गणित और राजनीतिक संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। विपक्ष का कहना है कि परिसीमन और जनगणना के आधार को लेकर कई सवाल हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण कानून का लागू होना जहां एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, वहीं इसके साथ जुड़े राजनीतिक और संवैधानिक पहलुओं को लेकर देश में नई बहस छिड़ गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।

