त्रेतायुग में वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को माता सीता का जन्म हुआ था। तभी से हर वर्ष इस पावन तिथि को सीता नवमी या जानकी जयंती के रूप में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता सीता की पूजा और व्रत करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और जीवन में धन, सुख, समृद्धि व ऐश्वर्य का आगमन होता है।
आज शनिवार को यह पर्व पूरे देश में भक्ति भाव के साथ मनाया जा रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा जनक यज्ञ भूमि तैयार करने के लिए हल चला रहे थे, तब उन्हें धरती से कलश में देवी सीता प्राप्त हुई थीं। इस कारण इस दिन को उनके प्राकट्य दिवस के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। यह पर्व खासकर महिलाओं के लिए सुख-शांति और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
पूजन के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं—
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:19 से 05:02
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:53 से दोपहर 12:45
सायाह्न सन्ध्या: शाम 06:53 से 07:58
निशिता मुहूर्त: रात 11:57 से 12:41
अमृत काल: शाम 06:29 से रात 08:04
इस पावन अवसर पर भक्त माता सीता और भगवान राम की विधि-विधान से पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी कष्ट दूर होते हैं।
पूजा को सफल बनाने के लिए विशेष सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। इसमें माता सीता और भगवान राम की प्रतिमा या चित्र, साफ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र, तांबे का कलश, नारियल, आम के पत्ते, गंगाजल, अक्षत, रोली, चंदन और धूप-दीप शामिल हैं। साथ ही माता सीता के श्रृंगार के लिए लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियां और अन्य सुहाग सामग्री रखी जाती है। भोग के रूप में पीले फल, केसरिया मिठाई या घर का बना शुद्ध हलवा अर्पित किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-पूजन करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और जीवन में समृद्धि आती है।

