डिजिटल डेस्क।जमशेदपुर :पूर्वी सिंहभूम जिले में ब्रेन मलेरिया महामारी का रूप लेता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के दावों को धत्ता बताते हुए यह जानलेवा बीमारी अब तक चार मासूमों को निगल चुकी है। जिले में हालात इस कदर बेकाबू हैं कि प्रशासन को हाई अलर्ट जारी करना पड़ा है। पूरे जिले में अब तक 60 से अधिक लोग इसकी चपेट में हैं, जिनमें अकेले पोटका प्रखंड से रिकॉर्ड 43 मरीज शामिल हैं, जिनका विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है।
एक बेबस पिता का दर्द: लाश दफनाऊं या तीसरी बेटी की जान बचाऊं?
इस पूरे संकट के बीच पोटका की हरिणा पंचायत के कंदर गांव से एक ऐसी हृदयविदारक कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। यहां के निवासी महावीर सरदार की दुनिया महज चार दिनों के भीतर पूरी तरह उजड़ गई। चार दिन पहले महावीर की 8 वर्षीय बड़ी बेटी सुबोला सरदार ने दम तोड़ा। सोमवार सुबह एमजीएम अस्पताल में चार दिनों तक जिंदगी की जंग लड़ने के बाद 1 वर्षीय मासूम खुशबू सरदार भी चल बसी। दुखों का पहाड़ यहीं नहीं टूटा, महावीर की तीसरी बेटी भी इस वक्त तेज बुखार की चपेट में है और बिस्तर पर पड़ी है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे इस गरीब पिता के सामने अब यह दर्दनाक मजबूरी खड़ी है कि वह अपनी एक साल की मृत बेटी का अंतिम संस्कार करे, या बची हुई आखिरी बेटी का इलाज कराने अस्पताल भागे।
पोटका बना ब्रेन मलेरिया का गढ़, डरा रहे हैं आंकड़े
जिले में फैल रहे इस संक्रमण की रफ्तार ने स्वास्थ्य महकमे की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी है। पूरे पूर्वी सिंहभूम जिले में अब तक 60 से ज्यादा लोग इस बीमारी से आक्रांत हो चुके हैं। सबसे भयावह स्थिति पोटका प्रखंड की है, जो इस वक्त ब्रेन मलेरिया का हॉटस्पॉट बना हुआ है। अकेले पोटका में 43 लोग इस बीमारी से ग्रसित हैं। चिंता की बात यह है कि अब तक हुई सभी 4 मौतें पोटका प्रखंड में ही हुई हैं और ये सभी बच्चे थे, जिनमें तीन स्कूली छात्राएं शामिल हैं। यह साफ इशारा करता है कि ग्रामीण इलाकों और स्कूलों के आसपास एंटी-मलेरिया फॉगिंग और साफ-सफाई की कितनी भारी कमी है।
अलर्ट सिर्फ कागजों पर? अस्पतालों में उमड़ रही भीड़
भले ही जिला प्रशासन ने पूरे पूर्वी सिंहभूम को हाई अलर्ट पर रख दिया है, लेकिन धरातल पर कंदर और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है। एमजीएम समेत जिले के विभिन्न अस्पतालों में मरीजों का इलाज चल रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर स्वास्थ्य विभाग ने समय रहते सतर्कता बरती होती और ग्रामीण इलाकों में दवाइयों व डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित की होती, तो शायद महावीर सरदार की दो मासूम बेटियों को बचाया जा सकता था। अब देखना यह है कि इस त्रासदी के बाद भी प्रशासन जागता है या आंकड़े यूं ही बढ़ते रहते हैं।

