गढ़वा : झारखंड के पश्चिमी छोर पर स्थित गढ़वा जिले में पवित्र बांकी (राधा रानी) नदी के तट पर बसे श्री बंशीधर नगर की पहचान भगवान श्री बंशीधर जी के दिव्य धाम के रूप में है. यहां श्री राधा रानी के साथ भगवान श्री बंशीधर जी की त्रिभंगी मुद्रा में विराजमान प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है.
बताया जाता है कि भगवान श्री बंशीधर जी शेषनाग के ऊपर कमल पुष्प पर त्रिभंगी यानी बांके स्वरूप में वंशीवादन करते हुए विराजमान हैं. उनकी अनुपम छवि को देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठते हैं.
भगवान के स्वयं यहां पधारने की मान्यता
मान्यता है कि भगवान श्री बंशीधर स्वयं इस धरती पर आकर विराजमान हुए. उनके आगमन के बाद विधि-विधान से प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर मंदिर का निर्माण कराया गया. भगवान के स्वयं यहां पधारने की मान्यता के कारण श्री बंशीधर नगर को योगेश्वर श्रीकृष्ण की भूमि तथा इस पावन धरती को द्वितीय मथुरा-वृंदावन के रूप में भी श्रद्धा से देखा जाता है.
रानी शिवमानी देवी को स्वप्न में मिले थे भगवान
जानकारों के अनुसार करीब दो सौ वर्ष पूर्व राजा स्वर्गीय भवानी सिंह देव के निधन के बाद उनकी धर्मपरायण पत्नी रानी शिवमानी देवी राजकाज संभाल रही थीं. रानी भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं. जन्माष्टमी के व्रत के दौरान 14 अगस्त 1827 की मध्यरात्रि में उन्हें स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य दर्शन हुए. भगवान ने रानी से वर मांगने को कहा. रानी ने अपने लिए कुछ मांगने के बजाय केवल भगवान की कृपा सदैव बनी रहने की प्रार्थना की.
तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें कनहर नदी के किनारे महुअरिया के समीप शिव पहाड़ी में अपनी प्रतिमा के दबे होने की जानकारी दी और उसे अपने राज्य में लाने का निर्देश दिया. इसे भगवान की कृपा मानकर रानी शिवमानी कुंवर ने शिव पहाड़ी पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना कर खुदाई कराई. खुदाई के दौरान भगवान श्री बंशीधर जी की अद्वितीय प्रतिमा प्राप्त हुई.
गढ़ के मुख्य द्वार पर रुक गया हाथी
बताया जाता है कि भगवान की प्रतिमा को हाथियों पर रखकर श्री बंशीधर नगर लाया जा रहा था. गढ़ के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही प्रतिमा को लेकर चल रहा अंतिम हाथी अचानक बैठ गया. लाख प्रयास के बावजूद हाथी वहां से नहीं उठा. इस घटना को भगवान की इच्छा मानते हुए रानी ने राजपुरोहितों से विचार-विमर्श किया और उसी स्थान पर मंदिर निर्माण कराने का निर्णय लिया.
इसके बाद वाराणसी से श्री राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाई गई और 21 जनवरी 1828 को भगवान श्री बंशीधर जी के साथ उनकी विधिवत स्थापना कराई गई.
देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु
आज श्री बंशीधर मंदिर देश-विदेश के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. मंदिर में विराजमान योगेश्वर श्रीकृष्ण की वंशीवादन करती दिव्य प्रतिमा की ख्याति दूर-दूर तक फैली है. इसी कारण यह पावन स्थल श्री बंशीधर धाम के नाम से भी प्रसिद्ध है.
यहां आने वाले श्रद्धालु श्री राधा-बंशीधर जी की मनमोहिनी छवि का दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं. आस्था रखने वाले भक्तों का विश्वास है कि श्री राधा बंशीधर जी युगल सरकार के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है. यहां के कण-कण में राधा और कृष्ण की भक्ति का भाव अनुभव किया जा सकता है.
जन्माष्टमी पर बढ़ जाती है विशेष महत्ता
जन्माष्टमी को लेकर श्री बंशीधर भगवान की महत्ता और बढ़ जाती है. इस दौरान वृंदावन की रासलीला और अयोध्या से पधारे आचार्य द्वारा कथा का श्रवण कराया जाता है.
मंदिर के ट्रस्टी सह नगर गढ़ के युवराज राजा राजेश प्रताप देव ने कहा कि हर वर्ष इस पर्व को विशेष तौर पर मनाया जाता है और यहां देश के विभिन्न राज्यों से लोग आते हैं. उन्होंने सरकार से श्री बंशीधर धाम को कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की मांग की.
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