डिजिटल डेस्क। जमशेदपुर : टाटा ग्रुप के भीतर स्वामित्व ढांचे और शेयर बाजार में लिस्टिंग के मुद्दों को लेकर घमासान तेज हो गया है। नोबेल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट ने टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से बचाने के लिए एक बड़ा और नया प्रस्ताव रखा है। इस रणनीतिक कदम के तहत टाटा संस को एनबीएफसी और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के नियामक दायरे से बाहर लाने की योजना है।
दो बड़ी कंपनियों का विलय: टाटा ट्रस्ट के प्रस्ताव के अनुसार, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्युशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस में विलय किया जाएगा।
लिस्टिंग से बचने की कोशिश: इस विलय का मुख्य उद्देश्य टाटा संस को एक गैर-सूचीबद्ध निजी कंपनी के रूप में बनाए रखना है, क्योंकि टाटा ट्रस्ट लगातार शेयर बाजार में इसकी लिस्टिंग का विरोध कर रहा है।
आरबीआई का दबाव: साल 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को ‘अपर लेयर’ एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया था, जिसके बाद से इसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध करना अनिवार्य हो गया था। हालांकि, आरबीआई ने सितंबर में टाटा संस के इस दर्जे से बाहर आने के अनुरोध को खारिज कर दिया था।
वित्तीय समीकरण और आंकड़े: टाटा ट्रस्ट के इस प्रस्ताव के मुताबिक, विलय के बाद बनने वाली इकाई की 31 मार्च, 2026 तक परिचालन आय 1,05,043 करोड़ रुपये (कुल आय का 64.3 प्रतिशत) होगी, जबकि वित्तीय परिसंपत्तियों से आय 40,072 करोड़ रुपये होगी।
नियामक शर्तों में बदलाव: इस पुनर्गठन के बाद पुनर्गठित टाटा संस एनबीएफसी के मुख्य कारोबार और सीआईसी से जुड़े मानदंडों को पूरा नहीं करेगी, जिससे पुरानी व्यवस्था बहाल हो सकेगी।
आगे की राह और प्रक्रिया
यह प्रस्ताव अब टाटा संस के निदेशक मंडल के विचाराधीन है। इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से 2025 के एनबीएफसी स्वैच्छिक विलय संबंधी दिशा-निर्देशों के तहत अनुमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होगा। पुनर्गठन पूरा होने के बाद टाटा संस सीआईसी के रूप में अपना पंजीकरण प्रमाणपत्र आरबीआई को सौंप देगी।

