गया में सोने-चांदी का कचरा भी है लाखों का खजाना! दीपावली पर लगती है बोली, 50 हजार से 5 लाख रुपये तक में बिकता है सुनारों का न्यारा

Reena Sharma
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गया में सुनारों की दुकानों से निकलने वाला कचरा आम कचरा नहीं, बल्कि लाखों रुपये का खजाना होता है। सोने-चांदी के आभूषण बनाने के दौरान कटाई, घिसाई और सफाई से निकलने वाले बारीक कणों को दुकानदार सालभर एक डिब्बे में जमा करते हैं। इसे स्थानीय भाषा में न्यारा कहा जाता है। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार दीपावली के समय इस न्यारे की बिक्री की जाती है।

इसे खरीदने के लिए न्यारी समुदाय के लोग अलग-अलग जगहों से गया पहुंचते हैं और दुकानों पर बोली लगाकर इसकी खरीदारी करते हैं। खास बात यह है कि जिस कचरे को आम लोग बेकार समझते हैं, उसकी कीमत 50 हजार से लेकर 5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।

दीपावली पर ही क्यों बिकता है सुनारों की दुकानों का कचरा?

गया की सर्राफा मंडी में करीब 300 से 350 आभूषण की दुकानें हैं। यहां सालभर आभूषण बनाने के दौरान निकलने वाले सोने-चांदी के बारीक कणों को धूल और अन्य कचरे के साथ सुरक्षित तरीके से जमा किया जाता है। इसके लिए दुकानों में अलग से एक डिब्बा रखा जाता है।

परंपरा के अनुसार दुकानदार साल में एक बार दीपावली के समय इस न्यारे को बेचते हैं। इस दौरान न्यारा खरीदने वाले कारोबारी दुकानों पर पहुंचते हैं और उसकी कीमत का आकलन कर बोली लगाते हैं।

25 हजार से शुरू होकर 5 लाख रुपये तक पहुंचती है कीमत

न्यारे की कीमत हर दुकान में अलग-अलग होती है। यह इस बात पर निर्भर करती है कि दुकान में कितने कारीगर काम करते हैं और सालभर में कितना सोने-चांदी का काम हुआ है। आमतौर पर एक दुकान का न्यारा 20 से 25 हजार रुपये से कम में नहीं बिकता। वहीं, अधिक कारीगरों और ज्यादा काम वाली दुकानों का न्यारा 50 हजार, एक लाख, दो लाख से लेकर 5 लाख रुपये या उससे अधिक में भी बिक सकता है।

हाथ में लेकर ही कीमत का अंदाजा लगा लेते हैं न्यारी समुदाय के लोग

न्यारा खरीदने वाले लोग इस काम में काफी अनुभवी होते हैं। वे कचरे को हाथ में लेकर ही उसमें मौजूद सोने-चांदी के कणों का अंदाजा लगा लेते हैं। इसके बाद उसी हिसाब से बोली लगाते हैं। दुकानदार को कीमत सही लगती है, तो वह एकमुश्त न्यारा बेच देता है। न्यारी समुदाय के लोगों का खास हुनर यही है कि वे धूल और कचरे से सोना, चांदी और तांबे जैसे अलग-अलग पदार्थों को छांटकर निकाल लेते हैं।

गया में यूपी, झारखंड, दिल्ली और सासाराम से पहुंचते हैं खरीदार

गया में दीपावली के समय न्यारा खरीदने के लिए बाहर से कारोबारी पहुंचते हैं। इस बार भी बनारस, झारखंड, दिल्ली और सासाराम से न्यारा खरीदने वाले लोग आए हैं। ये लोग सर्राफा मंडी की दुकानों पर जाकर न्यारे की खरीदारी करते हैं। उनके लिए दीपावली का यह समय कारोबार और कमाई का खास सीजन होता है। वहीं, दुकानदारों को भी सालभर जमा किए गए न्यारे को बेचकर अच्छी रकम मिल जाती है।

दुकानदारों के लिए दीपावली के खर्च का बनता है इंतजाम

कारीगर मोनू कुमार सोनी बताते हैं कि सालभर सोने-चांदी के आभूषण बनाने के दौरान जो छोटे-छोटे कण कटकर निकलते हैं, उन्हें अलग डिब्बे में जमा किया जाता है। इसी को न्यारा कहते हैं। इसे खरीदने के लिए झारखंड, दिल्ली और सासाराम सहित दूसरे स्थानों से लोग आते हैं। मोनू कुमार के अनुसार, इस बार वह दो डिब्बों में जमा न्यारा 50 हजार रुपये में बेच चुके हैं। इससे अच्छी कमाई हो जाती है।

आभूषण कारोबारी सुमित कुमार सोनी बताते हैं कि सोने-चांदी के आभूषण निर्माण के दौरान निकलने वाले कणों को सालभर जमा किया जाता है और दीपावली के समय एकमुश्त बेच दिया जाता है। इससे दुकान की साफ-सफाई और दीपावली के अन्य खर्चों का इंतजाम हो जाता है।

उनके मुताबिक, जिन दुकानों में 5 से 10 कारीगर काम करते हैं, वहां न्यारे की कीमत 5 लाख रुपये से भी अधिक हो सकती है। न्यारा खरीदने वाले लोग इसे अलग-अलग प्रक्रियाओं से साफ कर सोना, चांदी और तांबा निकालते हैं। यह काम उनके अनुभव और हुनर से ही संभव हो पाता है। इस तरह सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी गया की सर्राफा मंडी में निभाई जा रही है।

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