डिजिटल डेस्क। जमशेदपुर: झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में प्रस्तावित एसएम स्टील एंड पावर लिमिटेड परियोजना को लेकर जमीन अब सिर्फ एक अचल संपत्ति नहीं, बल्कि ग्रामीणों की अस्मिता और वजूद की लड़ाई बन चुकी है। हालांकि, दो दिन पहले कंपनी में ठीकेदारी को लेकर दो गुटों के बीच उपजा विवाद रविवार (12 जुलाई 2026) को नीमडीह थाने में आपसी समझौते के साथ शांत हो गया, लेकिन असली आग तो जमीन अधिग्रहण को लेकर सुलग रही है। ग्रामीणों का आक्रोश थमने के बजाय अब एक बड़े जनआंदोलन की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। सोमवार को आंदोलनकारी ग्रामीणों ने कंपनी के मुख्य गेट पर जोरदार धरना प्रदर्शन किया। हालांकि, कंपनी प्रबंधन से बातचीत के बाद फिलहाल धरना स्थगित कर दिया गया है, लेकिन ग्रामीणों ने दो टूक कह दिया है। जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक पैर पीछे नहीं हटेंगे।
कागजों पर रची गई 95% सहमति? करोड़ों के घोटाले का आरोप
आदरडीह, गौरडीह, रघुनाथपुर, सांगिड़ा, नीमडीह और केतूंगा जैसे दर्जनों मौजा के ग्रामीणों का गुस्सा बेवजह नहीं है। ग्रामीणों ने इस पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं।
फर्जी सहमति का दावा: ग्रामीणों का आरोप है कि 95 प्रतिशत से अधिक जमीन मालिकों ने अपनी सहमति ही नहीं दी है। इसके बावजूद कागजों में फर्जी तरीके से रजामंदी दिखाकर जमीन की खरीद-बिक्री का खेल खेला जा रहा है।
दलालों का बड़ा खेल: आरोप है कि जिस जमीन की वास्तविक सरकारी दर ₹44,000 प्रति डिसमिल है, उसे दलालों और बिचौलियों की साठगांठ से मात्र ₹11,000 प्रति डिसमिल दिखाया गया है। इसके जरिए करोड़ों रुपये की हेराफेरी की आशंका जताई जा रही है।
मुआवजे से महरूम किसान: कई गरीब और सीधे-साधे किसानों को अब तक फूटी कौड़ी भी मुआवजे के रूप में नहीं मिली है। गौरडीह की एक बुजुर्ग महिला ने रोते हुए अपना दर्द बयां किया—हमसे कहा गया कि ₹11,000 ही मिलेंगे, बाकी का पैसा नौकरी के रूप में एडजस्ट होगा। जब सरकार टैक्स लेती है, तो हमारे और सरकार के बीच ये दलाल क्यों हैं?
जनसुनवाई का बहिष्कार और ‘पुतला दहन’ का अल्टीमेटम
छह महीने पहले गौरडीह पंचायत भवन में मदन मोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई ग्रामसभा में जो चिंगारी सुलगी थी, वह अब 11 नवंबर को होने वाली आधिकारिक जनसुनवाई को अपनी चपेट में लेने को तैयार है। ग्रामीणों ने इस जनसुनवाई को जनता की नहीं, बल्कि कंपनी की सुनवाई करार दिया है। ग्रामीणों का गुस्सा सिर्फ कंपनी पर नहीं, बल्कि इलाके के जनप्रतिनिधियों पर भी फूट रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि जनता के वोट से चुने गए नेता आज कंपनी के साथ खड़े हैं। इसी के विरोध में आक्रोशित ग्रामीणों ने आगामी जनसुनवाई के दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन,
ईचागढ़ विधायक सविता महतो, मंत्री दीपक बिरुआ के पुतले फूंकने का बड़ा ऐलान किया है।
उपायुक्त के खिलाफ भी जाएंगे कोर्ट- आरके सिंह मुंडा
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राधाकृष्ण सिंह मुंडा ने साफ किया कि वे इस लड़ाई को कानूनी अंजाम तक ले जाएंगे। उन्होंने बताया कि जिला उपायुक्त को इस पूरे फर्जीवाड़े का ज्ञापन सौंपा जा चुका है। यदि प्रशासन ने समय रहते इस पर कोई निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की, तो ग्रामीण उपायुक्त के खिलाफ भी कानूनी मोर्चा खोलेंगे और अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
जमीन हमारी पहचान और अस्मिता है
ग्रामसभा और धरने के बाद भी घंटों पंचायत भवन परिसर में डटे ग्रामीणों ने एक सुर में कहा-यह संघर्ष सिर्फ एक स्टील कंपनी के खिलाफ नहीं है। यह हमारी जमीन, हमारे हक और हमारी आने वाली पीढ़ियों की पहचान को बचाने की लड़ाई है। जमीन हमारी अस्मिता है, इसे किसी कीमत पर बिकने नहीं देंगे।
प्रशासन के लिए ‘शार्ट सर्किट’ जैसी स्थिति
स्थानीय नीमडीह थाना और जिला प्रशासन भले ही ऊपरी तौर पर दावा कर रहा है कि मामले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लिया जाएगा, लेकिन जमीन स्तर पर हकीकत कुछ और है। ठीकेदारी का विवाद तो टेबल पर सुलझ गया, लेकिन माटी की लड़ाई इतनी आसानी से शांत होती नहीं दिख रही। अगर सरकार और प्रशासन ने दलालों पर लगाम कसकर किसानों के साथ न्याय नहीं किया, तो सरायकेला की यह धरती आने वाले दिनों में एक उग्र जनआंदोलन की गवाह बन सकती है।

