​कोल्हानवासियों का इंतजार खत्म: धालभूमगढ़ एयरपोर्ट की राह से हटी सबसे बड़ी अड़चन, हाथियों के खतरे पर रिपोर्ट साफ!

Manju
By Manju
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डिजिटल डेस्क।जमशेदपुर:जमशेदपुर और पूरे कोल्हान क्षेत्र के निवासियों के लिए सीधी हवाई सेवा का इंतजार जल्द खत्म होने जा रहा है। धालभूमगढ़ में प्रस्तावित नए एयरपोर्ट के निर्माण में आ रही सबसे बड़ी पर्यावरणीय अड़चन अब लगभग दूर हो चुकी है। डीएफओ सबा आलम अंसारी ने केंद्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मांगे गए 19 बिंदुओं की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट तैयार कर वन संरक्षक जमशेदपुर को भेज दी है। अब इसे राज्य सरकार और नोडल अधिकारी के माध्यम से केंद्र की फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

हाथियों के खतरे और एलीफेंट कॉरिडोर पर स्थिति साफ

केंद्रीय मंत्रालय द्वारा उठाई गई मुख्य चिंताओं में हाथियों और वन्यजीवों की सुरक्षा प्रमुख थी। अनुपालन रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह प्रस्तावित एयरपोर्ट किसी भी स्वीकृत हाथी कॉरिडोर के क्षेत्र में नहीं आता। यह स्थान घाटशिला-काकड़ाझोर कॉरिडोर से 15 किमी, मुसाबनी-चाकुलिया से 13-15 किमी और डुमरिया-कुंदालुका से करीब 17 किमी दूर स्थित है। पिछले 5 वर्षों (2020-2026) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस मौजा में मानव या हाथी के घायल होने या मौत की एक भी घटना दर्ज नहीं हुई है।

79,000 से अधिक पेड़ कटेंगे, बदले में दोगुनी भूमि पर होगा वृक्षारोपण

पर्यावरण के नुकसान की भरपाई के लिए क्षतिपूरक वनीकरण का बड़ा प्लान तैयार किया गया है।

पेड़ों की कटाई: परियोजना क्षेत्र में कुल 79,332 पेड़ या बांस के झुंड (74,794 पेड़ और 4,538 बांस) प्रभावित होंगे। इनमें से अधिकतर (60,233 पेड़) छोटी गोलाई (10-30 सेमी) वाले हैं।
दोगुनी भूमि पर वनीकरण: नुकसान की भरपाई के लिए 198.512 हेक्टेयर (दोगुनी भूमि) निम्नीकृत वन क्षेत्र में नए पौधे लगाए जाएंगे। यह पौधारोपण कुचीकानाली, बरडीहा, सांपधरा, झरिया, गुड़गुड़िया, कडोरिया और बाघघोरी मौजा में किया जाएगा।

सोनारी हवाई पट्टी क्यों बनी रुकावट?

रिपोर्ट में तकनीकी कारणों से सोनारी एरोड्रम को बड़े और व्यावसायिक विमानों के संचालन के लिए अनुपयुक्त बताया गया है। सोनारी के रनवे की लंबाई बेहद कम है और यह घनी शहरी आबादी से घिरा हुआ है, जिस वजह से इसका विस्तार करना असंभव है। ATR-72 और बोइंग जैसे बड़े विमानों के लिए धालभूमगढ़ ही एकमात्र उपयुक्त विकल्प है।

आर्थिक मजबूती: 50 सालों में ₹1,438 करोड़ का फायदा

धालभूमगढ़ एयरपोर्ट के लिए संशोधित कॉस्ट-बेनिफिट रेश्यो (1:48.6) तैयार किया गया है।

लागत-लाभ:रिपोर्ट के मुताबिक, अगले 50 सालों में अनुमानित पर्यावरण नुकसान (₹29.56 करोड़) की तुलना में क्षेत्र के समाज, व्यापार और अर्थव्यवस्था को मिलने वाला कुल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ ₹1,438.95 करोड़ होगा।

द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ा ऐतिहासिक इतिहास

धालभूमगढ़ का यह मैदान नया नहीं है, बल्कि इसका इतिहास द्वितीय विश्व युद्ध (1942) से जुड़ा है। इसे ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया था और अमेरिकी वायुसेना को सौंपा गया था।
1944 में अमेरिकी सैन्य मुख्यालय: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यह अमेरिकी वायुसेना का प्रमुख अड्डा था, जहां से हवाई हमले संचालित किए जाते थे।
1934-35 के मैप: पुराने रिकॉर्ड्स के अनुसार, 7.53 हेक्टेयर भूमि पहले से ही वि-वनीकृत के रूप में दर्ज है, यानी यह किसी नई वन भूमि को नष्ट करने का नहीं बल्कि पुरानी हवाई सुविधा के पुनर्विकास का मामला है।

एयरपोर्ट एक नज़र में

भूमि का कुल क्षेत्रफल: 99.985 हेक्टेयर (जिसमें 99.256 हेक्टेयर वन भूमि और 0.729 हेक्टेयर गैर-वन भूमि शामिल है)।
विमान क्षमता:पहले चरण में 72 सीटर ATR विमान और बाद के चरण में 150 सीटर बोइंग विमान उतर सकेंगे।
यात्री क्षमता व सुविधाएं: 150 यात्रियों की क्षमता, 2 एयरक्राफ्ट पार्किंग स्पेस और 6 चेकिंग काउंटर होंगे।
रनवे का आकार: 287 मीटर लंबाई और 30 मीटर चौड़ाई।

अधिग्रहण के तहत आने वाली प्रमुख भूमि (गांवों के अनुसार)

कोकपाड़ा:41.327 हेक्टेयर
बुरुडीह: 38.336 हेक्टेयर
चारचक्का: 13.713 हेक्टेयर
देवशोल:3.32 हेक्टेयर
रूआसोल: 0.065 हेक्टेयर

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