गिरिडीह से झारखंड की सत्ता के गलियारे तक पहुंचने वाले सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक सफर किसी शॉर्टकट की कहानी नहीं, बल्कि करीब तीन दशक के संघर्ष, संगठन और लगातार जमीन से जुड़े रहने की कहानी है। एक सामान्य पार्टी कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक पारी शुरू करने वाले सोनू दो बार गिरिडीह से विधायक बने और इसके बाद हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी तक पहुंचे। 6 सितंबर 2026 को 56 वर्ष की उम्र में उनके आकस्मिक निधन के साथ झारखंड की राजनीति ने एक सक्रिय और प्रभावशाली चेहरा खो दिया।
1989 में JMM से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
सुदिव्य कुमार सोनू का जन्म 26 जुलाई 1970 को गिरिडीह में हुआ था। वर्ष 1989 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्राथमिक सदस्य के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। उस दौर में झारखंड अलग राज्य की मांग और क्षेत्रीय अस्मिता का आंदोलन राजनीतिक और सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा था। सोनू इस आंदोलन से जुड़े और धीरे-धीरे संगठन में अपनी जगह बनाते चले गए।
संगठन के साथ उनकी सक्रियता बढ़ती गई। गिरिडीह में पार्टी के संगठनात्मक काम को मजबूत करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंबे समय तक पार्टी के लिए काम करने के कारण उन्हें जमीनी कार्यकर्ता के रूप में पहचान मिली। यही लंबा संगठनात्मक अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक ताकत बना।
संघर्ष के दौर में कई मुकदमों का सामना
झारखंड आंदोलन के दौर में सोनू ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन के साथ सक्रिय भूमिका निभाई। आंदोलन के दौरान उन पर एक दर्जन से अधिक मुकदमे दर्ज होने का उल्लेख भी विभिन्न रिपोर्टों में मिलता है। उनके राजनीतिक जीवन का यह दौर संघर्ष और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता से जुड़ा रहा।
सोनू की खासियत यह रही कि उन्होंने राजनीति में तत्काल सफलता की बजाय संगठन में लंबा समय दिया। पार्टी के अलग-अलग स्तरों पर जिम्मेदारियां संभालते हुए उन्होंने गिरिडीह में अपना मजबूत जनसंपर्क तैयार किया।
2009 में पहली बार चुनावी मैदान में उतरे
करीब दो दशक तक संगठन में काम करने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू ने वर्ष 2009 में गिरिडीह विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली। इसके बाद वर्ष 2014 में उन्होंने एक बार फिर विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन इस बार भी सफलता उनके हाथ नहीं लगी।
लगातार दो चुनाव हारने के बावजूद उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। संगठन और क्षेत्र में सक्रियता जारी रखी। यही वह दौर था जब उनकी पहचान ऐसे नेता के रूप में मजबूत होती गई, जो चुनावी हार के बाद भी मैदान से पीछे नहीं हटता था।
2019 में पहली बार बने विधायक
लगातार संघर्ष के बाद वर्ष 2019 में सुदिव्य कुमार सोनू को उनकी पहली बड़ी चुनावी सफलता मिली। उन्होंने गिरिडीह विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया। करीब तीन दशक पहले शुरू हुई राजनीतिक यात्रा अब जनप्रतिनिधि बनने के मुकाम तक पहुंच चुकी थी।
विधानसभा पहुंचने के बाद वे झामुमो के सक्रिय नेताओं में शामिल रहे। पार्टी संगठन के लंबे अनुभव और सरकार के कामकाज की समझ के कारण उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती गई।
छात्र आंदोलनों और सरकार के बीच संवाद का चेहरा
सुदिव्य कुमार सोनू की एक महत्वपूर्ण भूमिका सरकार और छात्रों के बीच संवाद कायम करने को लेकर भी रही। जेपीएससी-जेएसएससी से जुड़े विवादों और छात्र आंदोलनों के दौरान वे छात्रों से बातचीत करने वाली सरकार की ओर से प्रमुख चेहरों में रहे। उनकी संवाद क्षमता और बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की कोशिशों ने उन्हें सरकार के भीतर एक प्रभावी समन्वयक की पहचान दी।
इसी वजह से उन्हें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सहयोगियों में गिना जाने लगा।
2024 में दूसरी बार जीते और मंत्री बने
वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। इसके बाद 5 दिसंबर 2024 को उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली।
मंत्री बनने के बाद उनके पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति तथा खेलकूद एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी रही।
विकास को लेकर क्या था विजन?
मंत्री के रूप में सुदिव्य सोनू की राजनीति केवल विभागीय कामकाज तक सीमित नहीं रही। गिरिडीह के विकास को लेकर उन्होंने कई योजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उनके कार्यकाल से जुड़ी रिपोर्टों में गिरिडीह में विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, महिला महाविद्यालय के विकास, स्कूलों, लाइब्रेरी, बायोडायवर्सिटी पार्क और अन्य शैक्षणिक एवं आधारभूत परियोजनाओं का उल्लेख मिलता है।
गिरिडीह को पर्यटन के क्षेत्र में पहचान दिलाना भी उनकी प्राथमिकताओं में रहा। खंडोली, वाटरफॉल और उसरी नदी क्षेत्र के विकास के साथ-साथ झारखंड में पर्यटन की नई संभावनाओं को सामने लाने पर उन्होंने जोर दिया। माइनिंग टूरिज्म और इको-टूरिज्म को भी झारखंड की अर्थव्यवस्था और पहचान से जोड़ने की बात उनके विजन का हिस्सा रही।
गिरिडीह के विकास से जुड़े कई प्रोजेक्ट
उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ी रिपोर्टों में गिरिडीह में मेधा डेयरी परियोजना, फोरलेन और बायपास सड़क, पीरटांड़ की मेगा लिफ्ट सिंचाई परियोजना, सोलर सिटी की दिशा में काम तथा उसरी नदी के किनारे शास्त्री नगर से अरगाघाट तक मरीन ड्राइव जैसी योजनाओं का उल्लेख किया गया है। खंडोली और वाटरफॉल के सौंदर्यीकरण को भी उनके विकास विजन से जोड़ा गया।
इन योजनाओं के जरिए उनका फोकस शिक्षा, सड़क, पर्यटन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के साथ गिरिडीह की पहचान को मजबूत करने पर रहा।
हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सहयोगी
सुदिव्य सोनू सिर्फ सरकार के मंत्री नहीं थे, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के करीबी राजनीतिक सहयोगियों में भी गिने जाते थे। गंभीर राजनीतिक या छात्र मुद्दों पर सरकार और संबंधित पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
उनके निधन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उन्हें केवल राजनीतिक सहयोगी नहीं, बल्कि बड़े भाई और मार्गदर्शक के रूप में याद किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सोनू का जाना उनके लिए व्यक्तिगत क्षति है और उनकी कमी हमेशा महसूस होगी।
विपक्ष के नेताओं ने भी उनके निधन पर दुख जताया। भाजपा नेता प्रतुल शाहदेव और कांग्रेस नेता राजेश ठाकुर ने भी उनके राजनीतिक व्यवहार, संवाद क्षमता और सक्रियता को याद किया।
अचानक थम गया संघर्ष का सफर
करीब 37 वर्षों तक सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहने के बाद 6 सितंबर 2026 को सुदिव्य कुमार सोनू का आकस्मिक निधन हो गया। वह 56 वर्ष के थे। रिपोर्टों के अनुसार, गिरिडीह स्थित आवास पर रात में सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी मौत हो गई।
एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता से शुरू हुई यात्रा विधायक, दूसरी बार विधायक और फिर कैबिनेट मंत्री तक पहुंची। लेकिन यह सफर अचानक वहीं थम गया, जहां वह झारखंड की राजनीति और खासकर गिरिडीह के विकास में अपनी भूमिका को आगे बढ़ा रहे थे।
एक कार्यकर्ता की सबसे लंबी पारी
सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक कहानी की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि इसमें सफलता से पहले संघर्ष का लंबा दौर था। 1989 में पार्टी के प्राथमिक सदस्य से शुरुआत, वर्षों तक संगठन में काम, आंदोलन के दौर का संघर्ष, चुनावी हार, फिर 2019 में पहली जीत, 2024 में दूसरी जीत और अंततः कैबिनेट मंत्री का पद—यह उनकी करीब चार दशक लंबी राजनीतिक यात्रा का सार है।
उनकी कहानी इस मायने में भी अलग रही कि उन्होंने राजनीति में पद से पहले संगठन को महत्व दिया। गिरिडीह की स्थानीय राजनीति से राज्य की सत्ता तक पहुंचे सोनू ने अपने पीछे एक ऐसा राजनीतिक सफर छोड़ा है, जिसे झारखंड की राजनीति में लंबे समय तक याद किया जाएगा।

