धनबाद। सावन माह में 18 साल बाद ग्रहण का दुर्लभ संयोग बना है। इस बार 12 अगस्त को सावन अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण लग रहा है, जबकि 28 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा पर आंशिक चंद्र ग्रहण लगेगा। इससे पहले ऐसा संयोग वर्ष 2008 के सावन माह में बना था। उस समय 1 अगस्त को श्रावण अमावस्या पर सूर्य ग्रहण और 17 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण लगा था।
वर्ष 2026 का दूसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण आज, 12 अगस्त को लग रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह ग्रहण चंद्रमा की राशि कर्क में लगेगा। कर्क राशि में सूर्य, चंद्रमा, देव गुरु बृहस्पति और बुध की मौजूदगी से चतुर्ग्रही योग बन रहा है। इसके अलावा गजकेसरी सहित तीन शुभ योग बनने की भी बात कही जा रही है।
यह सूर्य ग्रहण सावन अमावस्या के अवसर पर लग रहा है, जिसे हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य ग्रहण अमावस्या और चंद्र ग्रहण पूर्णिमा तिथि पर लगता है।
4 घंटे 24 मिनट रहेगा सूर्य ग्रहण
सूर्य ग्रहण की अवधि करीब 4 घंटे 24 मिनट बताई जा रही है। जिन क्षेत्रों में पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देगा, वहां दिन में कुछ समय के लिए अंधेरा छा जाएगा। हालांकि यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा।
सामान्य मान्यता के अनुसार सूर्य ग्रहण का सूतक काल ग्रहण शुरू होने से 12 घंटे पहले प्रारंभ होता है। लेकिन भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देने के कारण यहां इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। ऐसे में लोग सामान्य दिनों की तरह अपने कामकाज कर सकते हैं।
समुद्र मंथन से जुड़ी है ग्रहण की पौराणिक कथा
सूर्य और चंद्र ग्रहण की पौराणिक कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत को भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को पिला रहे थे। इसी दौरान स्वर्भानु नामक असुर देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत पीने लगा।
सूर्य देव और चंद्र देव ने इसकी जानकारी भगवान विष्णु को दी। इसके बाद भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत का पान कर लेने के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई। मान्यता के अनुसार उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया।
पौराणिक मान्यता में राहु और केतु को ही ग्रहण का कारण माना जाता है। कहा जाता है कि अमावस्या के दिन राहु सूर्य को और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा को ग्रसने का प्रयास करता है, जिससे सूर्य और चंद्र ग्रहण लगता है।

