डिजिटल डेस्क/जमशेदपुर : दिग्गज स्टील निर्माता कंपनी टाटा स्टील ने चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। कंपनी ने अपने खर्चों को नियंत्रित करने के लिए करीब 7,100 करोड़ रुपये की लागत कटौती का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। शेयरधारकों को दी गई जानकारी के अनुसार इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए कंपनी जेनरेटिव एआई तकनीक का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने जा रही है। हालांकि इस लागत नियंत्रण अभियान का सीधा असर नई नौकरियों और कर्मचारियों की बहालियों पर भी देखने को मिल रहा है।
इन क्षेत्रों में पहले ही हो चुकी है बड़ी कटौती
कंपनी ने अपने टेक्निकल स्टैक के आधुनिकीकरण, ग्लोबल रिपोर्टिंग और वर्कफोर्स के बेहतर उपयोग के लिए पूरे संगठन में ‘जेन एआई’ को लागू करने की रणनीति बनाई है। इससे पहले कंपनी विभिन्न मदों में भारी बचत कर चुकी है।
रॉ मैटेरियल (कच्चा माल): 46 फीसदी की कटौती
पावर व फ्यूल (ऊर्जा और ईंधन): 36 फीसदी की कटौती
स्टोर, रिपेयर व मेंटेनेंस: 18 फीसदी की कटौती
पिछले वित्तीय वर्ष तक कंपनी कुल 10,868 करोड़ रुपये की लागत कम करने में सफल रही है। ईंधन की खपत घटाने के लिए एआई मॉडल लागू किए गए, जिससे सुपर-क्रिटिकल मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट में होने वाली देरी को 92 फीसदी तक कम किया गया है।
वेज कॉस्ट कम करने की रणनीति: नई भर्तियों पर ब्रेक
कंपनी ने अपने सकल घाटे को कम करने के लिए ‘वेज कॉस्ट’ (कर्मचारियों के वेतन पर होने वाला खर्च) को भी कड़े दायरे में ला दिया है। इसके तहत कई कड़े कदम उठाए गए हैं।
ब्लू-कॉलर कर्मचारियों की बहाली बंद: पिछले दो वर्षों से कंपनी ने ब्लू-कॉलर कर्मचारियों की कोई नई बहाली नहीं की है।
ट्रेड अप्रेंटिस पर रोक: ट्रेड अप्रेंटिस समेत अन्य सभी महत्वपूर्ण नियुक्तियों को फिलहाल रोक दिया गया है।
आउटसोर्सिंग के जरिए काम: अब कंपनी जरूरत के अनुसार वर्कफोर्स ‘टाटा स्टील टेक्निकल सर्विसेज’ और ‘टाटा स्टील सपोर्ट सर्विसेज’ के माध्यम से ले रही है।
वेतनमान में कटौती: नई नियुक्तियों के वेतनमान में भी कटौती की गई है।
वरिष्ठ अधिकारियों को मिली बड़ी जिम्मेदारी
लागत नियंत्रण के इस महा-अभियान को सफल बनाने के लिए टाटा स्टील के वरिष्ठ अधिकारियों को अलग-अलग और विशेष जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। कंपनी का पूरा ध्यान अब पारंपरिक तरीकों को छोड़कर तकनीक आधारित ऑटोमेशन और स्मार्ट वर्कफोर्स मैनेजमेंट पर है, ताकि कम लागत में अधिकतम उत्पादन हासिल किया जा सके।

