झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट साझा कर धर्मांतरण, आदिवासी पहचान और आरक्षण के मुद्दे पर बड़ा बयान दिया है। उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।
चम्पाई सोरेन ने कहा कि झारखंड के आदिवासी और मूलवासी समाज सदियों से एक-दूसरे की आस्था, परंपराओं और धार्मिक स्थलों का सम्मान करते आए हैं। उन्होंने दावा किया कि सरना स्थल, जाहेरस्थान, देशाउली और मंदिरों के बीच हमेशा सह-अस्तित्व की परंपरा रही है, लेकिन धर्मांतरण की बढ़ती प्रक्रिया आदिवासी संस्कृति और पहचान के लिए गंभीर चुनौती बन गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट में आरोप लगाया कि ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों के कारण आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली, भाषा, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं पर असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में धर्मांतरण के चलते सरना स्थलों और जाहेरस्थानों पर पूजा करने वालों की संख्या कम हो गई है, जो चिंता का विषय है।
चम्पाई सोरेन ने यह भी कहा कि जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, उन्हें अपनी नई पहचान के साथ रहने का पूरा अधिकार है, लेकिन अनुसूचित जनजाति समाज को मिले आरक्षण और संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार आदिवासी समाज के अधिकारों और पहचान की रक्षा के लिए आवश्यक संवैधानिक कदम उठाए।
अपने बयान में उन्होंने चर्चों के लिए भूमि हस्तांतरण और सीएनटी-एसपीटी एक्ट के प्रावधानों की जांच की भी मांग की। साथ ही कहा कि यदि धर्मांतरण की प्रक्रिया नहीं रुकी तो भविष्य में आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान और संस्कृति पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
चम्पाई सोरेन की इस पोस्ट के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। समर्थक इसे आदिवासी हितों की आवाज बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे विवादित और विभाजनकारी बयान करार दे रहे हैं।

