दीपक प्रकाश का मंत्री पद जाना तय, विधान परिषद् में एंट्री के रास्त बंद, अब क्या विकल्प?

Neelam
By Neelam
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बिहार की राजनीति में इन दिनों पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश चर्चा के केंद्र बिंदु बने हैं। बिहार में एमएलसी के चुनाव को लेकर जब प्रत्याशियों का ऐलान हुआ तो दीपक प्रकाश का नाम कहीं नहीं आया।  भारतीय जनता पार्टी ने बिहार सरकार में छह महीने के अंदर दूसरी बार मंत्री बने दीपक प्रकाश के लिए विधान परिषद् का रास्ता नहीं खोला। अब यह तय माना जा रहा है कि दीपक प्रकाश बहुत जल्द मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। दरअसल, वह किसी सदन के सदस्य नहीं हैं।

दीपक प्रकाश का इस्तीफा पूरी तरह तय

संवैधानिक नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य रहे मंत्री बनता है, तो उसे 6 महीने के भीतर सदस्यता लेनी अनिवार्य होती है। उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश वर्तमान में किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, लेकिन वह मंत्री हैं। बीते 7 मई को सम्राट चौधरी की सरकार में मंत्री पद की शपथ लेने के बाद यह एमएलसी चुनाव उनके लिए सदन में प्रवेश करने का एकमात्र मौका था। सोमवार (8 जून) को नामांकन का आखिरी दिन बीत जाने के बाद यह साफ हो गया कि दीपक प्रकाश अब सदन नहीं जा रहे हैं।

दीपक प्रकाश के पास अब करीब पांच महीने का वक्त

दीपक प्रकाश पहली बार मंत्री बने 20 नवंबर 2025 को। वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे। ऐसे में छह महीने के अंदर उन्हें कम-से-कम विधान परिषद् की सदस्यता तो हासिल करनी ही थी। इस बीच, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही 14 अप्रैल को मंत्रिपरिषद् विघटित हो गई। इस हिसाब से देखा जाए तो 20 मई तक उन्हें सदस्य बनना था। इसके पहले सरकार गिर गई। फिर जब नई सरकार 15 अप्रैल को बनी और सात मई को मंत्रिमंडल विस्तार हुआ तो दीपक प्रकाश को एक बार फिर से शपथ दिलाई गई। उसके बाद, 20 मई का वक्त निकल चुका है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कुछ होना था तो 20 मई तक हो गया रहता, इसका मतलब है कि 07 अप्रैल 2026 से दीपक प्रकाश के लिए छह महीने की गणना होगी। इस हिसाब से उनके पास अब भी करीब पांच महीने का वक्त है। 

उपेन्द्र कुशवाहा के सामने ऐसी स्थिति क्यों आई?

अब सवाल यह है कि आखिर उपेन्द्र कुशवाहा के सामने ऐसी स्थिति क्यों आई। सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा के सामने एक शर्त रखी थी। बीजेपी चाहती थी कि दीपक प्रकाश को बीजेपी के सिंबल (कमल छाप) पर एमएलसी चुनाव लड़ाया जाए। लेकिन, बताया जाता है कि उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे को बीजेपी के सिंबल पर भेजने के लिए तैयार नहीं हुए। इसके पीछे बीजेपी का वह दबाव भी माना जा रहा है, जिसमें वे चाहते थे कि कुशवाहा अपनी पार्टी ‘राष्ट्रीय लोक मोर्चा’ का विलय भारतीय जनता पार्टी में कर दें। हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा ने हाल ही में पटना के राज्य सम्मेलन में साफ कर दिया कि वे अपनी पार्टी का वजूद खत्म नहीं करेंगे। ऐसे में स्वाभिमान की इसी लड़ाई में उनके बेटे की कुर्सी दांव पर लग गई।

अब कौन सा कदम उठाएंगे उपेंद्र कुशवाहा?

अब बेटे दीपक प्रकाश का मंत्री पद गया तो उपेंद्र कुशवाहा कौन सा कदम उठा सकते हैं सियासी गलियारे में इसकी चर्चा शुरू हो गई है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आगे भी एनडीए का हिस्सा रहेगी। उनकी पार्टी से उनकी पत्नी स्नेहलता सहित कुल चार विधायक हैं। ऐसे में कुशवाहा किसी और को मंत्री बनाने की मांग एनडीए में कर सकते हैं। दूसर ओर ये भी हो सकता है कि बिना मांग के भी उनकी पत्नी या किसी और विधायक को मंत्री बना दिया जाए।

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