बांकीपुर में क्या है बीजेपी की हार की वजह, जानें कहां हुईचूक ?

Neelam
By Neelam
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बिहार के बांकीपुर के बहुचर्चित उप चुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज की है। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्य सभा के लिए चुने जाने के बाद खाली हुई थी। पटना के शहरी क्षेत्र में आने वाली यह सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है लेकिन इस बार के नतीजों में बड़ा उलटफेर हुआ।

202 सीटें जीतने वाली अपना गढ़ नहीं बचा पाई

नौ महीने पहले ही बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 243 सीटों में 202 पर जीत दर्ज की थी। जबकि उन चुनावों में जनसुराज पार्टी का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका था। बांकीपुर को बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीट समझा जाता रहा है। हालांकि, बीजेपी बांकीपुर सीट बचा नहीं सकी।

बीजेपी के गढ़ में प्रशांत किशोर ने दी चुनौती

बांकीपुर सीट से बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन विधायक थे। उन्हें पार्टी ने अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। राज्यसभा के लिए सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफ़ा दे दिया था। पांच जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जन सुराज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी की घोषणा की थी। जिसके बाद यह यह हाई प्रोफ़ाइल मुक़ाबले में बदल गई। इससे पहले नवंबर 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी ने अधिकांश सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। जन सुराज पार्टी साल 2025 के चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। पार्टी का प्रदर्शन इतना खराब रहा कि उसके 238 में से 236 उम्मीदवार अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाए। ऐसे में सवाल उठ रहे है नौ महीनें में ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी अपना घर ही नहीं बचा सकी।

बीजेपी ने अंतिम समय में बदला था उम्मीदवार

इस सीट पर बीजेपी की ओर से घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा ने अंतिम समय में पारिवारिक कारण बताते हुए 10 जुलाई को अपना नामांकन वापस ले लिया था। जबकि कुछ घंटे पहले तक बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बांकीपुर में अभिषेक कुमार के लिए लोगों से वोट मांग रहे थे। इसके बाद पार्टी ने नीरज कुमार सिन्हा को अपना उम्मीदवार घोषित किया। नीरज साल 2006 से बीजेपी के सदस्य हैं और दो बार मंडल अध्यक्ष रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर प्रशांत किशोर का कहना था कि जनता के पास अब विकल्प आ गया है तो बीजेपी को अब उम्मीदवार नहीं मिल रहा है।

नीरज सिन्हा की सीमित स्थानीय पहचान

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, बीजेपी की हार के पीछे पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा की स्थानीय पहचान अपेक्षाकृत सीमित रहना भी है। टिकट बदलने को लेकर भी कार्यकर्ताओं में शुरुआती असमंजस देखने को मिला।

युवा और शिक्षित मतदाताओं का झुकाव

प्रशांत किशोर ने बेरोजगारी, पेपर लीक और बिहार से पलायन जैसे मुद्दों को लगातार चुनाव के केंद्र में रखा, जिसका असर खासकर युवा और शिक्षित मतदाताओं पर दिखाई दिया।

बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में सेंध

इसके अलावा, बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक में भी इस बार सेंध लगी। बांकीपुर बीजेपी का पारंपरिक सवर्ण बहुल इलाका माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ब्राह्मण समाज से आने वाले प्रशांत किशोर को सवर्ण मतदाताओं, खासकर ब्राह्मण वोटों का एक हिस्सा मिला। वहीं राजपूत और भूमिहार वोटरों ने भी प्रशांत किशोर की ओर झुकाव दिखाया।

आरजेडी के कमजोर चुनाव प्रचार

वहीं आरजेडी के कमजोर चुनाव प्रचार का फायदा भी जन सुराज को मिला, जिससे बीजेपी विरोधी वोटों का बड़ा हिस्सा प्रशांत किशोर के पक्ष में जाता दिखा।

सीएम सम्राट चौधरी के खिलाफ लोगों में नाराजगी!

वहीं, जानकार इसकी एक खास वजह बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ लोगों की नाराजगी भी मान रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी के लिए सही फैसला नहीं था। इसका असर सिर्फ बांकीपुर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में देखने को मिल रहा है। बांकीपुर पहला चुनाव था, इसलिए इस नाराजगी का सीधा असर यहां के नतीजों में दिखाई दिया।

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