34 साल पहले किए गए एक गुनाह के लिए 84 साल के बुजुर्ग को अब जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ रहा है। बिहार की एक अदालत ने 1992 में हत्या की कोशिश के मामले में एक बुज़ुर्ग को दोषी ठहराया है। 34 साल की लंबी देरी के बावजूद, अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 147, 148 और 307 के तहत दोषी पाया है। जिसके बाद बिना सहारे के खड़े हो पाने में भी असमर्थ बुजुर्ग आरोपी को जेल भेज दिया गया।
जवानी के गुनाह की बुढ़ापे में मिली सजा
बिहार के वैशाली जिला कोर्ट ने राघोपुर प्रखंड अंतर्गत जुड़ावनपुर थाना क्षेत्र के 34 साल पहले हुए एक जानलेवा हमला के मामले में फैसला सुनाते हुए, जीवित बचे एकमात्र आरोपी को जेल भेज दिया। सोशल मीडिया पर इसकी एक तस्वीर तेजी से वायरल हो रहा है। जो तस्वीर सामने आई है इसके अनुसार एक वृद्ध व्यक्ति न्यायालय परिसर से निकल रहा है, जिनका शरीर साथ नहीं दे रहा है। उठने बैठने के लिए भी दो लोगों की जरूरत पड़ रही है।
5 में से 4 आरोपियों की हो चुकी है मौत
यह वारदात आज से करीब 34 साल पहले, साल 1992 की है। आपसी रंजिश और पुरानी दुश्मनी को लेकर एक दंपत्ति पर हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग कर जानलेवा हमला किया गया था। इस मामले में उस समय एक ही परिवार के 5 लोगों को नामजद आरोपी बनाते हुए जुड़ावनपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया और तीन दशकों से अधिक समय तक चली सुनवाई के दौरान 5 में से 4 आरोपियों की मौत हो गई। इस मामले में महज एक आरोपी जीवित बचा, जो आज ढलती उम्र के आखिरी पड़ाव पर है।
दंपत्ति पर की गई थी अंधाधुंध फायरिंग
इस मामले में शिकायतकर्ता अदालत राय ने 10 मई 1992 को जुड़ावनपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई शिकायत में आरोप लगाया था कि जब वह अपनी पत्नी के साथ अपने घर के दरवाजे पर बैठे थे, तभी हथियारों से लैस अपराधियों ने पुरानी दुश्मनी में उन पर जानलेवा हमला कर दिया और गोलीबारी शुरू कर दी। उस समय की गई पुलिस जांच के बाद, 1993 में ही अदालत में आरोप पत्र दायर कर दिया गया था।

