फाल्गुन पूर्णिमा पर परंपराओं के साथ मनाया जाएगा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व
2 मार्च, सोमवार को देशभर में होलिका दहन धूमधाम से मनाया जाएगा। हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर यह पर्व मनाया जाता है, लेकिन इस बार होलिका दहन पर पूरी रात भद्रा का साया रहने वाला है। ऐसे में ज्योतिषाचार्यों ने भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में ही होलिका दहन करने की सलाह दी है।
पूर्णिमा तिथि का समय
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – 2 मार्च, शाम 5:55 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त – 3 मार्च, शाम 5:07 बजे
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 2 मार्च को होलिका दहन, 3 मार्च को चंद्र ग्रहण और 4 मार्च को रंगों वाली होली खेली जाएगी।
कब तक रहेगी भद्रा?
भद्रा का प्रारंभ 2 मार्च को शाम 5:55 बजे से होगा और 3 मार्च को सुबह 5:28 बजे तक रहेगा। यानी पूरी रात भद्रा का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों के अनुसार, भद्रा मुख में कोई भी शुभ कार्य वर्जित माना जाता है, लेकिन यदि पूरी रात भद्रा हो तो भद्रा पुंछ में होलिका दहन करना शास्त्र सम्मत है।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त
इस बार होलिका दहन भद्रा पुंछ में मध्यरात्रि 12:50 बजे से 2:27 बजे तक किया जाएगा। इसी अवधि में अग्नि प्रज्वलित करना शुभ माना गया है।
होलिका दहन की पौराणिक कथा
होलिका दहन की कथा असुर राजा हिरण्यकश्यप और उनके पुत्र प्रह्लाद से जुड़ी है। कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था, जबकि प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई।
होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, लेकिन अधर्म के कारण वह स्वयं अग्नि में भस्म हो गईं और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। तभी से यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
होलिका पूजन विधि
होलिका दहन से पहले महिलाएं और परिवारजन शुभ समय में पूजन करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
पूजा सामग्री में शामिल हैं:
सूखी लकड़ियां, गेहूं की बालियां, गोबर के उपले, सूखी घास, फूल, गुलाल, मूंग, गुड़, धूप, हल्दी, अक्षत, रोली, जौ, कलश में जल, बताशा, नारियल, कपूर, मिठाई, कच्चा सूत या रक्षा सूत्र आदि।
पूजन के बाद होलिका की परिक्रमा कर परिवार की खुशहाली और नकारात्मक शक्तियों के नाश की प्रार्थना की जाती है।
धार्मिक और सामाजिक महत्व
होलिका दहन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आस्था, सामाजिक समरसता और नई शुरुआत का प्रतीक है। मान्यता है कि होलिका की अग्नि से नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
सामूहिक रूप से होलिका दहन करने से समाज में भाईचारा, प्रेम और सद्भाव की भावना मजबूत होती है।

