उग्र स्वरूप में भी भक्तों की रक्षा करती हैं मां कालरात्रि, विशेष विधि-विधान से की जाती है पूजा
चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन जैसे-जैसे नजदीक आता है, भक्तों के घरों में श्रद्धा और भक्ति का माहौल और गहरा हो जाता है। सुबह की आरती, धूप-दीप की सुगंध और मां दुर्गा के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। इस दिन मां दुर्गा के उग्र लेकिन कल्याणकारी स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है।
मां कालरात्रि का स्वरूप अन्य देवियों से अलग और अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। उनका श्याम वर्ण, खुले केश, गले में विद्युत की भांति चमकती माला और तीन नेत्र उन्हें शक्तिशाली रूप प्रदान करते हैं। हालांकि उनका रूप भयानक प्रतीत होता है, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए सुरक्षा कवच के समान मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यता है कि मां कालरात्रि अंधकार, भय और नकारात्मक शक्तियों का नाश कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं, इसी कारण उन्हें “शुभंकारी” भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर विशेष फल की प्राप्ति होती है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। इसके बाद रोली, कुमकुम, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। पूजा में सादगी और श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।
भोग के रूप में मां कालरात्रि को गुड़ और चने अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के पश्चात प्रसाद को परिवार में वितरित किया जाता है और अंत में आरती की जाती है, जिसे पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
इस दिन मां के बीज मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः” का जाप विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस मंत्र के नियमित जाप से मन को शांति मिलती है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।
शुभ रंग के रूप में नीले रंग को विशेष महत्व दिया गया है। इसे आत्मविश्वास और शांति का प्रतीक माना जाता है, इसलिए कई भक्त इस दिन नीले वस्त्र धारण कर पूजा करते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे दैत्यों ने तीनों लोकों में आतंक मचाया, तब मां दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण कर उनका संहार किया। रक्तबीज के वरदान को समाप्त करने के लिए मां ने उसकी हर रक्त बूंद को जमीन पर गिरने से पहले ही समाप्त कर दिया, जिससे बुराई का अंत हुआ।
चैत्र नवरात्रि का यह सातवां दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, जो उन्हें यह संदेश देता है कि साहस, आस्था और सकारात्मक सोच से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।

