डिजिटल डेस्क। जमशेदपुर :सरायकेला-खरसावां जिले की पुलिस को नक्सल विरोधी अभियान में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। दलमा की तराई स्थित सघन जंगलों में चलाए गए विशेष सर्च ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने असीम मंडल दस्ते के तीन शीर्ष हार्डकोर नक्सलियों को धर दबोचा है। पकड़े गए नक्सलियों पर कुल 22 लाख रुपये का इनाम घोषित था, जिनमें 15 लाख रुपये का इनामी नक्सली मदन महतो भी शामिल है। पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई दलमा की तराई और नीमडीह थाना क्षेत्र के जंगलों में चलाए गए एक गुप्त और विशेष अभियान के तहत की गई। गिरफ्तार किए गए तीनों नक्सलियों का लंबा आपराधिक इतिहास रहा है और ये लालगढ़ आंदोलन के समय से ही संगठन में सक्रिय थे।
मदन महतो उर्फ शंकर उर्फ चरण उर्फ बंकिम
निवासी:करमसोल, थाना सालबनी, जिला पश्चिम मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल)इनाम:₹15 लाख
हथियार: AK-47 राइफल रखता था।
सागर सिंह उर्फ बिरेन उर्फ फौजी उर्फ रवि (छोटा विजय)
निवासी:टेगाडीह (बेनाडीह), थाना नीमडीह, जिला सरायकेला-खरसावां (झारखंड)
इनाम:₹05 लाख
हथियार: इन्सास राइफल रखता था।
मीना पहाड़िया (पति: सागर सिंह)
निवासी:आमकोचा, थाना बलरामपुर, जिला पुरुलिया (पश्चिम बंगाल)
इनाम: ₹02 लाख
हथियार: राइफल रखती थी।
सांसद सुनील महतो हत्याकांड समेत कई बड़ी वारदातों में थे शामिल
गिरफ्तार किए गए ये तीनों नक्सली क्षेत्र में हुई कई भीषण और चर्चित आपराधिक घटनाओं के मुख्य आरोपी हैं।
सांसद सुनील महतो हत्याकांड (4 मार्च 2007):बागुड़िया में हुए इस भयावह नक्सली हमले में तत्कालीन सांसद सुनील महतो, झामुमो के प्रखंड सचिव प्रभाकर महतो और सांसद के दो बॉडीगार्ड शहीद हो गए थे। इस मामले में ये तीनों नामजद आरोपी हैं।
बुलुडीह लैंड माइंस विस्फोट (30 अगस्त 2008):इस धमाके में 11 जवान शहीद हुए थे।
अन्य प्रमुख वारदातें:सितंबर 2008 में घाटशिला के दीवा-चापड़ी में दो लोगों की हत्या, नीमडीह में झामुमो नेता कृष्णा महतो की हत्या (22 अगस्त 2008) और केशरपुर में माकपा नेता सतीश महतो की हत्या (2 दिसंबर 2006)। इसके अलावा घाटशिला, गालूडीह और एमजीएम थाना क्षेत्रों में दर्जनों नक्सली घटनाओं में इनकी संलिप्तता रही है।
कमजोर पड़ा असीम मंडल का दस्ता, पुलिस दबिश से दो गुटों में बंटा संगठन
इस कार्रवाई से असीम मंडल का दस्ता पूरी तरह से ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच गया है। 10 से 11 नक्सलियों वाले इस दस्ते में अब मात्र 7-8 सदस्य ही बचे हैं, जिनमें सचिन, समीर, मीता और बुलू जैसे नक्सली शामिल हैं, जो फिलहाल जंगलों में छिपे हुए हैं। जानकारी के अनुसार वर्ष 2005-06 से 2018 तक यह दस्ता पूर्वी सिंहभूम से लेकर बंगाल सीमा तक सक्रिय था। 2018 में ये सारंडा चले गए थे, लेकिन मिसिर बेसरा और अनल दा के मारे जाने के बाद संगठन कमजोर हुआ और ये पुनः झारखंड-बंगाल सीमावर्ती क्षेत्र में लौट आए। पुलिस की लगातार दबिश के कारण दस्ता दो गुटों में बंट गया था, जिनमें से एक गुट दलमा क्षेत्र में और दूसरा घाटशिला के बीहड़ों में शरण लिए हुए था।
देर रात तक चौका थाने में डटे रहे वरिष्ठ अधिकारी
अभियान की संवेदनशीलता को देखते हुए एसपी देर रात स्वयं चौका थाना पहुंचे और पूरे ऑपरेशन की सीधी निगरानी की। इस दौरान चांडिल अनुमंडल समेत जिले के कई वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारी और सुरक्षा बल के जवान चौका थाना परिसर में मुस्तैद रहे। सुरक्षा कारणों से थाना परिसर की घेराबंदी बढ़ा दी गई थी।
आईजी अनूप बिरथरे का बयान
सरायकेला-खरसावां जिले से तीन नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई है, जिनमें दो पुरुष और एक महिला शामिल हैं। ये तीनों इनामी हैं और लालगढ़ आंदोलन के समय से सक्रिय रहे हैं। यह पुलिस के लिए एक बड़ी सफलता है। क्षेत्र में पुलिस का अभियान लगातार जारी रहेगा और बचे हुए नक्सलियों को भी जल्द ही दबोच लिया जाएगा।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक पूछताछ के दौरान नक्सलियों के नेटवर्क, स्थानीय सहयोगियों और फंड जुटाने के तरीकों को लेकर कई अहम जानकारियां मिली हैं, जिनके आधार पर आगे की छापेमारी की जा रही है।

