जमुई-झाझा में गुम हो गई सिक्कों की खनखनाहट, चॉकलेट ने ले ली ₹1 और ₹2 की जगह

KK Sagar
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झाझा/जमुई। एक समय था जब बाजार, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और छोटी-बड़ी दुकानों में ₹1 और ₹2 के सिक्कों की खनखनाहट आम बात थी। चाय की दुकान से लेकर किराना, सब्जी और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी तक इन सिक्कों का खूब इस्तेमाल होता था। लेकिन अब जमुई और झाझा के बाजारों में इन छोटे सिक्कों की मौजूदगी लगातार कम होती जा रही है। स्थिति यह है कि खुले पैसे के बदले दुकानदार ग्राहकों को चॉकलेट, टॉफी या अन्य छोटी वस्तुएं थमा रहे हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ₹1 और ₹2 के सिक्कों को आज भी पूरी तरह वैध मुद्रा घोषित किया गया है। इसके बावजूद बाजार में इन्हें लेकर एक तरह की अनिच्छा देखने को मिल रही है। कई दुकानदार छोटे सिक्के लेने से बचते हैं, जबकि कुछ ग्राहक भी इन्हें अपने पास रखने के बजाय घरों में जमा कर देते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे ये सिक्के बाजार से लगभग गायब होने लगे हैं।

झाझा के कई दुकानदार बताते हैं कि ग्राहक जब ₹1 या ₹2 के सिक्के देते हैं तो उन्हें आगे चलाने में परेशानी होती है। वहीं ग्राहक भी शिकायत करते हैं कि जब उनके पैसे वापस करने की बारी आती है तो दुकानदार खुल्ले के बदले चॉकलेट पकड़ा देते हैं। कई बार ग्राहक मजबूरी में इसे स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि छोटी राशि के लिए बहस करना उन्हें उचित नहीं लगता।

बाजार में अब यह एक सामान्य चलन बन चुका है। यदि किसी सामान की कीमत ₹19, ₹29 या ₹49 होती है तो बचे हुए ₹1 या ₹2 लौटाने के बजाय दुकानदार चॉकलेट या टॉफी दे देते हैं। हालांकि कानूनी रूप से ग्राहक को उसके पैसे लौटाना दुकानदार की जिम्मेदारी है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह व्यवस्था धीरे-धीरे स्वीकार्य होती जा रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि छोटे सिक्कों के प्रति लोगों की धारणा भी इस समस्या के लिए जिम्मेदार है। कई लोग मानते हैं कि ₹1 और ₹2 के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। जानकारी के अभाव में लोग इन सिक्कों को लेने और उपयोग करने से बचते हैं, जिससे बाजार में इनकी उपलब्धता लगातार घटती जा रही है।

विडंबना यह है कि जिन सिक्कों को बाजार में नजरअंदाज किया जा रहा है, वही सिक्के मंदिरों के दान-पात्रों, गरीबों को सहायता देने और भिक्षा देने में आज भी बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन रोजमर्रा के व्यापारिक लेन-देन में उनकी उपयोगिता लगातार कम होती दिखाई दे रही है।

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि प्रशासन और बैंकिंग संस्थानों को इस विषय पर लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। यदि ₹1 और ₹2 के सिक्के पूरी तरह वैध हैं, तो उन्हें बाजार में सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही दुकानदारों को भी ग्राहकों को खुले पैसे के बदले चॉकलेट देने की बजाय वैध मुद्रा लौटाने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए और अगर ये अगर इससे भी बात नहीं बनती है तो जिला प्रशासन को सख़्ती अपनानी चाहिए और सिक्के को स्वीकार्य नहीं करने वाले या लेन देन नहीं किये जाने वाले दोनों पक्षो पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

फिलहाल जमुई और झाझा के बाजारों में सिक्कों की खनखनाहट इतिहास बनती जा रही है और उनकी जगह चॉकलेट ने ले ली है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में ₹1 और ₹2 के सिक्के केवल दान-पात्रों और संग्रह तक सीमित होकर रह जाएंगे, या फिर बाजार में उनकी वापसी हो पाएगी।

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