मुख्यमंत्री राबड़ी देवी द्वारा पटना स्थित ’10 सर्कुलर रोड’ आवास को खाली करने को लेकर बिहार में सियासत गरमा गई है। बिहार सरकार द्वारा तीन नोटिस जारी किए जाने के बावजूद राबड़ी देवी ने फिलहाल 10 सर्कुलर रोड स्थित आवास खाली करने से साफ इनकार कर दिया है। अब राबड़ी देवी को आवास खाली करने के लिए 15 दिनों की अंतिम मोहलत दी गई है। अब सवाल ये है कि यदि इस समय सीमा के बाद भी आवास खाली नहीं होता है, तो सरकार क्या कदम उठाएगी?
फिलहाल 15 दिन की राहत
राबड़ी देवी को फिलहाल 15 दिन की राहत मिल गई है। पटना जिला प्रशासन ने अपने अफसरों के जरिए राबड़ी देवी तक ये जानकारी पहुंचा दी है। लेकिन 15 दिन के बाद राबड़ी देवी को बंगला खाली करने को भी कहा गया है। जिला प्रशासन ने ये भी साफ कर दिया है कि इसके लिए लीगल तरीके अपनाए जाएंगे और आगे की कार्रवाई की जाएगी।
बंगला खाली नहीं हुआ तो क्या करेगी सरकार?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इस अवधि के बाद भी राबड़ी देवी ने बंगला खाली नहीं किया, तो सरकार क्या करेगी? यदि राबड़ी देवी अपने स्टैंड पर कायम रहती हैं और स्वेच्छा से बंगला खाली नहीं करती हैं, तो सम्राट चौधरी सरकार के पास कानून की किताब से लेकर राजनीतिक कूटनीति तक कई रास्ते मौजूद हैं।
कानूनी सहारा लेगी सरकार
राज्य सरकार के नियमों के अनुसार, सत्ता परिवर्तन या नए आवंटन की स्थिति में सरकारी आवास खाली कराना एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती है। यदि कोई आवंटी निर्धारित अवधि के बाद भी आवास नहीं छोड़ता है तो संबंधित विभाग उसे अनधिकृत कब्जाधारी मानते हुए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकता है। आमतौर पर पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है, फिर जवाब संतोषजनक नहीं होने पर बेदखली की कार्रवाई और जुर्माने जैसी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
2008 में कुशवाहा को सरकारी आवास खाली करने के लिए नोटिस
बता दें कि बिहार में पहले भी सरकारी आवास को खाली करने को लेकर ऐसा मामला सामने आ चुका है। साल 2008 में उपेंद्र कुशवाहा से भी सरकारी आवास को खाली कराने के लिए सरकार को ‘पापड़ बेलने’ पड़े थे। बिहार के राजनीतिक इतिहास में सरकारी बंगला खाली कराने को लेकर सबसे बड़ा विवाद 2008 में सामने आया था, जब उपेंद्र कुशवाहा को जबरन बेदखल किया गया था। बिहार में आरजेडी सरकार के कार्यकाल के दौरान 2004 में नीतीश कुमार के करीबी होने के नाते उपेंद्र कुशवाहा को बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था और उन्हें 30 बेली रोड स्थित सरकारी आवास आवंटित किया गया था।
कुशवाहा ने बंगला खाली करने से किया था इनकार
2005 में हुए चुनाव में कुशवाहा हार गए और 2007 में वैचारिक मतभेदों के कारण उन्हें जदयू से निष्कासित कर दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने बंगला खाली करने से इनकार कर दिया। बाद में वह शरद पवार की पार्टी NCP के प्रदेश अध्यक्ष बन गए और इसी आवास से अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ जारी रखीं। भवन निर्माण विभाग और विधानसभा ने उन्हें आवास खाली करने के लिए कई नोटिस भेजे, लेकिन उन्होंने आवास खाली नहीं किया। जब कई नोटिस मिलने के बाद भी कुशवाहा ने आवास खाली नहीं किया तो 16 मई 2008 को पुलिस की एक टीम उनके बंगले पर पहुंची। हालांकि, उस समय कुशवाहा पटना से बाहर थे। 26 जून को सुरक्षा बलों की पूरी टुकड़ी के साथ पुलिस टीम फिर पहुंची, लेकिन कुशवाहा अपनी बात पर अड़े रहे और टस से मस नहीं हुए। 22 जुलाई 2008 को पुलिस एक बार फिर उनके आवास पर पहुंची, लेकिन NCP कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।
जब जबरदस्ती सामान बाहर किया गया
आखिरकार 17 अगस्त 2008 को पटना जिला प्रशासन पूरी तैयारी के साथ उपेंद्र कुशवाहा के आवास पर पहुंचा। इस बार परिवार के सदस्यों के कड़े विरोध के बावजूद मजिस्ट्रेट के आदेश पर घर का एक-एक सामान जबरदस्ती बाहर निकाला गया और ट्रैक्टरों पर लाद दिया गया। उपेंद्र कुशवाहा को उस रात होटल में रुकना पड़ा, जबकि उनके घर का सामान पार्टी कार्यालय में रखना पड़ा।

