देशभर में शुक्रवार को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व जन्माष्टमी धूमधाम से मनाया जा रहा है। घरों से लेकर मंदिरों तक पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का दौर जारी है। श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर रहे हैं और रात 12 बजे उनके जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना करेंगे।
कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है पर्व
जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, कृष्ण जयंती, श्रीकृष्ण जयंती, यदुकुलाष्टमी और अष्टमी रोहिणी जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में अवतार लिया था। इसी कारण जन्माष्टमी पर आधी रात को भगवान के जन्म के समय पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
व्रत रखकर भगवान की आराधना कर रहे श्रद्धालु
जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। कई भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार करते हैं। दिनभर भगवान कृष्ण के भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और कथा श्रवण का सिलसिला चलता है।
रात में भगवान के जन्म के समय पूजा-अर्चना के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। भक्त भगवान श्रीकृष्ण से परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की खुशहाली और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं। बाल गोपाल की पूजा, उनका श्रृंगार और झूला सजाकर उन्हें झुलाने की भी परंपरा है।
कब शुरू और कब खत्म होगी अष्टमी तिथि
पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3-4 सितंबर की मध्यरात्रि 2:30 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:30 बजे तक रहेगी। इसी वजह से जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जा रहा है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र रात 11:04 बजे तक रहेगा।
जन्माष्टमी पर बन रहे कई शुभ योग
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष जन्माष्टमी पर कई शुभ योग बन रहे हैं। श्रीकृष्ण जयंती योग और हर्षण योग के साथ गुरु के उच्च राशि में होने से हंसराज योग बनने की बात कही गई है। वहीं शुक्र के उच्च राशि में होने से मालव्य राजयोग, सिंह राशि में सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग तथा नवपंचम राजयोग बनने का उल्लेख किया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन शुभ योगों में भगवान श्रीकृष्ण की विधि-विधान से पूजा करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और नकारात्मकता दूर होने की मान्यता है।
सुबह से शुरू करें पूजा की तैयारी
जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान कर साफ कपड़े पहनने और घर के साथ पूजा स्थल की सफाई करने की परंपरा है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या लड्डू गोपाल को स्वच्छ चौकी पर पीले या लाल वस्त्र के ऊपर विराजमान किया जाता है। दीपक जलाकर भगवान का ध्यान करने के बाद श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत का संकल्प लिया जाता है।
दिनभर भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप, भजन और कथा का श्रवण किया जा सकता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार निर्जला या फलाहार व्रत रख सकते हैं।
फलाहार में ले सकते हैं सात्विक भोजन
जन्माष्टमी पर सात्विक भोजन और विचार रखने की परंपरा है। फलाहार करने वाले श्रद्धालु फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना तथा कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन ग्रहण कर सकते हैं। हालांकि व्रत के नियम परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
आधी रात को होगा कान्हा का जन्मोत्सव
मध्यरात्रि यानी रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा की जाती है। इस दौरान लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराने के बाद स्वच्छ जल से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद भगवान को नए वस्त्र पहनाकर मुकुट, मोरपंख, बांसुरी और आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है।
पूजा में चंदन, अक्षत, फूल और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद माखन-मिश्री, पंचामृत, फल, मिठाई या पंजीरी का भोग लगाया जाता है। धूप-दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण की आरती की जाती है और शंख-घंटी बजाकर जन्मोत्सव मनाया जाता है।
मध्यरात्रि में पूजा का विशेष महत्व
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा मध्यरात्रि यानी रात 12 बजे के आसपास करने का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसी समय भक्त भगवान के जन्म का उत्सव मनाते हैं और पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करते हैं।

