डिजिटल डेस्क। मिरर मीडिया: पश्चिमी सिंहभूम का एशिया प्रसिद्ध सारंडा जंगल एक बार फिर वन्यजीवों के लिए कब्रगाह साबित हुआ है। नक्सलियों द्वारा सुरक्षाबलों को निशाना बनाने के लिए बिछाए गए आईईडी ने इस बार एक विशालकाय दंतैल हाथी की जान ले ली। सासंगदा-लेबरागढ़ा नाला के पास पिछले 10 दिनों से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे इस गजराज ने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद न सिर्फ वन विभाग, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों में गहरा आक्रोश और शोक है।
10 दिनों तक चली जिंदगी की जंग, रेड जोन बना इलाज में बाधा
हाथी की जान बचाने के लिए वन विभाग और मनोहरपुर के पशु चिकित्सकों की टीम ने दिन-रात एक कर रखा था। उसे रोजाना एक से डेढ़ क्विंटल ताजी सब्जियां, फल और भारी मात्रा में जीवन रक्षक दवाइयां व इंजेक्शन दिए जा रहे थे।
सुरक्षा बनी सबसे बड़ी चुनौती
वन अधिकारियों के मुताबिक जिस इलाके में हाथी घायल पड़ा था, वह घोर नक्सल प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील है। सुरक्षा कारणों और भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से घायल हाथी को किसी अत्याधुनिक अस्पताल या दूसरे सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करना मुमकिन नहीं हो सका। आखिरकार चिकित्सा टीमों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी हालत बिगड़ती गई और उसने दम तोड़ दिया।
सारंडा में बारूदी सुरंगों का आतंक: अब तक 5 हाथियों की मौत
यह कोई पहली घटना नहीं है। सारंडा के जंगलों में नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच चलने वाली इस जंग की कीमत यहां के मूक वन्यजीवों को चुकानी पड़ रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो इस इलाके में आईईडी की चपेट में आने से अब तक 5 हाथियों की दर्दनाक मौत हो चुकी है। जंगल के असली हकदार अब अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं। बारूदी सुरंगों के इस जाल ने हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर को डेथ जोन में तब्दील कर दिया है।
ग्रामीणों में आक्रोश, वन्यजीव प्रेमियों ने उठाई बड़ी मांग
इस घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों में वन विभाग से ज्यादा नक्सलियों के इस कृत्य के खिलाफ गुस्सा है। ग्रामीणों ने हाथी को बचाने के लिए शुरुआती दिनों में अपने स्तर पर भी काफी प्रयास किए थे।
वन्यजीव प्रेमियों की चेतावनी
पर्यावरण और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि अगर जंगलों को आईईडी मुक्त नहीं किया गया, तो सारंडा से हाथियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। उन्होंने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि एंटी-नक्सल ऑपरेशन के साथ-साथ ‘डी-माइनिंग’ (जंगल से आईईडी हटाने) का विशेष अभियान चलाया जाए। संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्रों में सुरक्षा और निगरानी के आधुनिक पुख्ता इंतजाम किए जाएं।

