सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश विधान परिषद के सदस्य बन गए हैं। कोर्ट में फजीहत से बचने के लिए 31 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी ने अपने एमएलसी देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवाया और उनकी जगह दीपक प्रकाश का मनोनय हो गया। गुरुवार को उन्होंने एमएलसी की शपथ ली और शुक्रवार को बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को इस संबंध में जानकारी दी।
बिहार सरकार की दलील
बिहार सरकार ने अदालत को बताया कि दीपक प्रकाश को अब बिहार विधान परिषद का सदस्य नामित किया जा चुका है। उन्होंने एमएलसी के रूप में शपथ भी ले ली है। इससे मंत्री दीपक प्रकाश की अयोग्यता का मुद्दा अब बचता नहीं है। बिहार सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दीपक प्रकाश अब विधान परिषद के सदस्य हैं। संविधान के अनुसार, विधायक या विधान पार्षद बनने के बाद उनके मंत्री बने रहने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। इसलिए इस मामले को अब बंद कर दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने नियुक्ति और नामांकन का रिकॉर्ड सरकार से मांगा
बिहार सरकार के जवाब पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने मंत्री दीपक प्रकाश की एमएलसी पद पर नियुक्ति और नामांकन का सरकार से रिकॉर्ड मांगा है। वही, बिहार सरकार द्वारा मामला बंद करने की मांग का याचिकाकर्ता ने विरोध किया। उसका कहना है कि मूल सवाल दीपक प्रकाश के एमएलसी बनने का नहीं, बल्कि छह महीने की अवधि समाप्त होने के बाद उनकी दोबारा नियुक्ति की वैधता का है। इसलिए मामले में संवैधानिक मुद्दे पर फैसला जरूरी है।
याचिकाकर्ता ने कहा मनोनय में संवैधानिक उल्लंघन
वहीं, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने बताया कि दीपक प्रकाश का एमएलसी के तौर पर गलत तरीके से मनोयन हुआ है। इस वजह से मामले को बंद न किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कथित संवैधानिक उल्लंघन पहले ही हो चुका है। दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य बनाने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया गलत है। दीपक प्रकाश साहित्य, विज्ञान, कला या समाज सेवा से जुड़े नहीं है। ऐसे में राज्यपाल ने उनका गलत मनोयन किया है।

