बिहार की सियासत में कुछ ऐसे नाम है जो छात्र राजनीति के दौरान उभरे और आज भी बिहार की सत्ता के केन्द्र में बने हुए हैं। लालू यादव, नीतीश कुमार, ललन सिंह, सरयू राय, शिवानंद तिवारी ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने शुरुआती दौर में एक साथ राजनीति की लेकिन बाद में सबकी राहें जुदा हो गई। बीच के कुछ सालों को छोड़ दें को राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह हमेशा नीतीश कुमार के साथ परछाई की तरह डटे रहे। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब नीतीश के सामने लालू प्रसाद यादव ने ललन सिंह को अपने कमरे से बाहर निकाल दिया था। ये बात नीतीश को कलेजे में तीर की तरह चुभ गई थी और वहीं से बिहार की राजनीति ने वो मोड़ लिया जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
शिवानंद तिवारी का सोशल मीडिया पोस्ट
लालू प्रसाद के राजनीतिक मित्र और राजद नेता शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने अपने पोस्ट में राजनीति के एक रोचक कहानी शेयर करते हुए लिखते हैं कि ‘नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा को दो खंडों में देखा जा सकता है। पहला खंड वह है, जब वे सत्ता से बाहर थे। वे पहली बार 1985 में बिहार विधानसभा के सदस्य बने। इसके बाद उनकी राजनीति तेज़ी से आगे बढ़ी। 1989 में वे बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्य मंत्री बने, हालांकि यह सरकार केवल लगभग 15 महीने ही चल सकी।1991 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में वे फिर से बाढ़ से सांसद निर्वाचित हुए।’
कैसे लालू के व्यवहार से असहज हुए थे नीतिश
शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा है कि ‘1991 के लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद की एक चर्चित घटना है। चर्चित इस अर्थ में कि कई लोगों ने उस घटना के बारे में अपने-अपने तरीके से लिखा है। संकर्षण ठाकुर की किताब में शायद वह घटना सबसे पहले आई थी। मैंने उसको पढ़ा नहीं है। लेकिन वह घटना लालू और नीतीश दोनों के मिजाज और चरित्र को जरूर दर्शाती है।’ यह घटना दिल्ली स्थित बिहार भवन की है, जहां एक मुलाकात के दौरान उस समय के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के बीच माहौल अचानक असहज हो गया था। इस मुलाकात में ललन सिंह और वृष्णि पटेल भी मौजूद थे। शिवानंद तिवारी के मुताबिक, बैठक के दौरान लालू यादव ने बिना कुछ कहे इशारे से ललन सिंह को कमरे से बाहर जाने को कहा। इस अप्रत्याशित व्यवहार से वहां मौजूद सभी लोग हैरान रह गए और माहौल अचानक गंभीर हो गया। ललन सिंह चुपचाप बाहर निकल गए, जबकि बाकी लोग असहज स्थिति में बैठे रहे।
बिहार की राजनिति का अहम दिन
शिवानंद तिवारी के मुताबिक ’91 के मध्यावधि चुनाव में वृष्णि पटेल भी सिवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा आए थे। बिहार भवन में उनको कमरा मिला था। दिल्ली में उन दिनों मेरा मुकाम नीतीश का ही घर हुआ करता था। जिस दिन की यह घटना है, उस दिन हम लोग यानी नीतिश कुमार, ललन सिंह, वृष्णि पटेल और मैं, पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर कोई फिल्म देख रहे थे। फिल्म समाप्त होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू जी भी दिल्ली आ गए हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में हैं। नीतीश कुमार ने ही कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री जी से मिल लिया जाए।’
ललन सिंह लालू के पास जाने से हिचकिचा रहे थे
शिवानंद के अनुसार, ललन पता नहीं क्यों जाने को इच्छुक नहीं थे। नीतीश ने कहा कि- अरे चलिए, ऐसा क्या है। लेकिन तब भी ललन जाने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब नेता कह रहा है तो चलो, क्या हर्ज है। मैंने नीतीश के लिए नेता शब्द का इस्तेमाल किया है। हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे। यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था।’
लालू फाइल में डूबे थे
हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुँचे। वहाँ देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू प्रसाद यादव बैठे हुए थे। सामने एक लंबी टेबल थी, जिस पर एक खुली फाइल रखी थी। फाइल में केवल एक पन्ना दिखाई दे रहा था और उनके हाथ में खुली हुई कलम थी। उनकी नज़र फाइल पर ही टिकी थी, उन्होंने हमारी ओर देखा भी नहीं। हम लोग अंदर गए और जिसे जहाँ जगह मिली, वहीं बैठ गए या खड़े हो गए। एक दूसरा लंबा सोफा था, जिस पर नीतीश कुमार और पटेल साहब बैठ गए। सामने रखी एक गोदरेज टेबल से टेक लगाकर ललन सिंह खड़े हो गए, जबकि मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया।
उंगली के इशारे से ललन सिंह को दिखाया कमरे से बाहर का रास्ता
लालू यादव ने बग़ैर कुछ कहे, अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन की ओर देखा और उंगली के इशारे से उसको कमरे से बाहर का रास्ता दिखाया। सब लोग हतप्रभ हो गए। ललन भी पहले उस इशारे को नहीं समझ पाए। तब लालू ने दोबारा उनको बाहर जाने का इशारा किया। ललन चुपचाप सिर झुकाकर वहां से बाहर निकल गए। मैंने नीतिश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर नजर उठाई। ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा उतर गया था। ललन अपनी मर्जी से लालू के यहां नहीं गया था। एक तरह से नीतीश ही दबाव देकर उनको वहां ले गए थे।
सरयू राय का नाम लेकर लालू ने दी थी गाली
इसके बाद लालू यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली गलौज करना शुरू कर दिया। लालू सरयू राय को क्यों गलिया रहे हैं हम लोग इससे बिल्कुल अनभिज्ञ थे। बाद में पता चला कि राय जी ने पटना के नवभारत टाइम्स में एक लेख लिखा था। उन्होंने लालू सरकार पर आरोप लगाया था कि बिहार के हित के विरुद्ध इसने सोन नहर के पानी को भारत सरकार के तत्कालीन बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया है। विधानसभा का सत्र चल रहा था। विपक्ष ने उस खबर पर विधानसभा में शोरशराबा मचाया था। सरयू राय, नीतिश कुमार के मित्र हैं। इसी पृष्ठभूमि में लालू यादव अत्यंत आक्रोश में थे और सरयू राय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि यह सब कौन करा रहा है। उनका इशारा नीतीश कुमार की ओर था।’
शिवानंद तिवारी ने दी थी कड़ी प्रतिक्रिया
शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा कि लालू यादव की टिप्पणी और व्यवहार से उनका धैर्य टूट गया। उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए बैठक छोड़ने की बात कही और नीतीश कुमार से भी वहां से उठने को कहा। स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई, जब माहौल पूरी तरह टकराव की ओर बढ़ने लगा। शिवानंद तिवारी आगे लिखते हैं, स्थिति बिगड़ती देख लालू यादव ने तुरंत हस्तक्षेप किया और माहौल को शांत करने के लिए चाय मंगाई। उन्होंने तिवारी को शांत करने की कोशिश की और नीतीश कुमार को बैठने के लिए कहा। इसके बाद किसी तरह बातचीत खत्म हुई और सभी वहां से निकल गए।
लालू यादव को जवाब देने की बनी रणनीति
बिहार भवन से निकलने के बाद नीतीश कुमार के आवास पर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा हुई। तय किया गया कि लालू यादव को इस व्यवहार के खिलाफ एक कड़ी चिट्ठी लिखी जाएगी। घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ़ को आदेश दिया कि किसी का फोन नहीं देना है। किसी से मिलना नहीं है। पटना सरयू राय को फोन लगाइए. राय जी को फोन गया कि शाम जहाज़ से दिल्ली पहुँचिये। शाम तक राय जी दिल्ली हाज़िर हो गए। पूरी घटना पर चर्चा हुई। तय हुआ कि बिहार भवन में जो कुछ भी हुआ उसके विरोध में लालू यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए। राय जी चिट्ठी का मज़मून तैयार करें। दो ढाई पेज का मज़मून राय जी ने तैयार किया। नीतीश कुमार ने राय जी को सुझाया कि इसको थोड़ा छोटा कर दें। राय जी ने फिर लिखने में हाथ लगाया।
डेढ़ पेज की वो चिठ्ठी जो लिखी गई पर भेजी नहीं गई
इधर नीतीश ने कहा कि वे शरद जी से मिल आते हैं। मैंने कहा कि शरद जी से मिलने जाओगे तब तो चिट्ठी नहीं जाएगी। नीतीश जी ने झुंझला कर जवाब दिया कि शरद जी नेता हैं। उनसे क्यों नहीं मिलें। मैंने जवाब दिया कि ज़रूर मिलो। मैं तो सिर्फ़ उस मुलाक़ात के नतीजे की बात कर रहा हूँ। नीतीश शरद जी से मिल कर आये। इस बीच राय जी ने ढाई पेज को डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया था। नीतीश जी ने कहा कि इसको और छोटा कर दीजिए। इसको पटना पहुँचने के बाद लालू जी को भेजा जाएगा। अंततोगत्वा समझा जाए कि उस चिट्ठी का कोई औचित्य नहीं रहा। लेकिन वह मूल चिठ्ठी छपी हुई है, श्री कांत की किताब ‘चिठ्ठियों की राजनीति’ में। यह प्रसंग यही समाप्त करता हूँ।

