पलामू। झारखंड में खनन और स्टोन क्रशर उद्योग में न्यायालय के निर्देशों तथा प्रदूषण नियंत्रण मानकों की अनदेखी का मामला एक बार फिर चर्चा में है। पलामू जिले में संचालन सहमति (सीटीओ) समाप्त होने या नवीकरण नहीं होने के बावजूद बड़ी संख्या में माइंस और स्टोन क्रशर के अवैध संचालन का आरोप सामने आया है।
जानकारी के अनुसार, जिले के छतरपुर, नौडीहा बाजार, सतबरवा, चैनपुर, रामगढ़, पिपरा, हरिहरगंज और पांकी सहित कई प्रखंडों में 50 से अधिक माइंस तथा 70 से अधिक स्टोन क्रशर सीटीओ फेल होने के बावजूद संचालित हो रहे हैं। आरोप है कि जिन इकाइयों का संचालन सहमति पत्र समाप्त हो चुका है, वहां भी पत्थर उत्खनन, परिवहन और क्रशिंग का कार्य लगातार जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि राज्य सरकार को खनिज राजस्व, रॉयल्टी और अन्य शुल्कों के रूप में करोड़ों रुपये के नुकसान की भी आशंका है। बताया जाता है कि पलामू में हर महीने लाखों टन पत्थर का कारोबार होता है और यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए तो वास्तविक राजस्व हानि का बड़ा आंकड़ा सामने आ सकता है।
गौरतलब है कि झारखंड हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वन क्षेत्र, आबादी, स्कूल-कॉलेज, धार्मिक स्थल, कब्रिस्तान, श्मशान घाट, नदी और अन्य संवेदनशील स्थानों से निर्धारित दूरी पर ही माइंस और स्टोन क्रशर का संचालन किया जाए। इसके बाद राज्य में निर्धारित दायरे में आने वाले कई माइंस और क्रशरों का प्रदूषण प्रमाणपत्र तथा सीटीओ नवीकरण बंद कर दिया गया था।
इसके बावजूद आरोप है कि कई स्थानों पर बिना वैध सीटीओ और बिना आवश्यक दस्तावेजों के खनिजों का उत्खनन और परिवहन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्रशर से निकलने वाली धूल गांवों तक पहुंच रही है, जिससे सांस की बीमारी, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। वहीं लगातार ब्लास्टिंग और भारी मशीनों के इस्तेमाल से भूमि कंपन, जल स्रोतों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित विभागों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं।

