राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को बड़ा राजनीतिक झटका लगने जा रहा है। पार्टी के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने वाले हैं।सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, लालू यादव के पुराने ‘सिपाही’ मृत्युंजय तिवारी की बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत पूरी हो चुकी है। वे आज यानी शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर बीजेपी में शामिल हो जाएंगे।
16 जुलाई को दिया था आरजेडी से इस्तीफा
भाजपा के प्रदेश कार्यालय में आयोजित मिलन समारोह में प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाएंगे। मृत्युंजय तिवारी ने 16 जुलाई को राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। हालांकि उस समय प्रदेश अध्यक्ष ने उनसे तेजस्वी यादव के लौटने तक इंतजार करने का आग्रह किया था। इसके बाद तिवारी ने राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी से भी मुलाकात की थी। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें मनाने और निर्णय बदलने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बन सकी। अंततः उन्होंने भाजपा में शामिल होने का फैसला कर लिया।
लंबे समय से चल रही थी नाराजगी
मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि वह पिछले कई महीनों से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी बातें रखते रहे, लेकिन उनकी शिकायतों और सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि करीब 20 वर्षों तक उन्होंने राजद के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ काम किया, लेकिन बदले में उन्हें लगातार उपेक्षा का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि पार्टी में कार्यकर्ताओं की बात सुनने की परंपरा कमजोर होती जा रही है और उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया गया। इसी कारण उन्होंने राजद छोड़ने का फैसला किया।
बांकीपुर उपचुनाव से पहले आरजेडी को झटका
बांकीपुर में होने वाले उपचुनाव से पहले बीजेपी में मृत्युंजय तिवारी के शामिल होने से पार्टी को जहां फायदा होता नजर आ रहा है, वहीं राजद को बड़ा झड़का। माना जा रहा है कि बीजेपी बांकीपुर में पार्टी प्रत्याशी नीरज सिन्हा के लिए मृत्युंजय तिवारी का इस्तेमाल कर सकती है। जहां वो राजद के खिलाफ वोट मांग सकते हैं।
आरजेडी का प्रमुख चेहरा रहे हैं मृत्युंजय तिवारी
मृत्युंजय तिवारी लंबे समय तक आरजेडी का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उनकी गिनती लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी और भरोसेमंद नेताओं में होती रही है। मृत्युंजय तिवारी खुद भी कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी हमेशा उन्हें बहुत मानते रहे हैं। हालांकि, हाल के दिनों में पार्टी के भीतर जिस तरह से उन्हें अलग-थलग किया जा रहा था और उनकी अनदेखी हो रही थी, उससे आहत होकर उन्होंने राजद को छोड़ने का कदम उठाया था।

